क्या है मुंबई ट्रेन ब्लास्ट मामला
हालांकि, बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, बॉम्बे हाई कोर्ट की जस्टिस अनिल किकरे और जस्टिस श्याम चंदक की खंडपीठ ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। अदालत ने गवाहों की गवाही पर भी गंभीर संदेह जताया और कहा कि जिन चश्मदीदों को घटना के 100 दिन बाद पहचान परेड के लिए बुलाया गया, वे कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दे सके।
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि अधिकतर गवाहों की पहचान और गवाही अप्रत्याशित और असंगत थीं, जिससे अभियोजन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए। अदालत ने माना कि इतने गंभीर मामले में जांच और साक्ष्यों की प्रस्तुति बहुत कमजोर रही।
गौरतलब है कि 11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इस आतंकी हमले ने पूरे देश को हिला दिया था। घटना के बाद महाराष्ट्र सरकार ने मकोका (MCOCA) के तहत विशेष अदालत में मुकदमा चलाया। अक्टूबर 2015 में कोर्ट ने कॉमल रिज़वान, मोहम्मद फैसल, एहतेशाम सऊदी, नवीद हुसैन और सिंगर खान को बम प्लांट करने का दोषी मानते हुए मृत्युदंड सुनाया था। वहीं, अन्य सात आरोपियों को उम्रकैद की सजा दी गई थी।
इनमें से एक आरोपी, कॉमल रिज़वान की मौत 2021 में जेल में कोविड-19 संक्रमण के कारण हो गई थी।
उम्रकैद की सजा पाने वालों में तनवीर अहमद वकील, मोहम्मद माजिद शफी, शेख मोहम्मद अली आलम, मोहम्मद साजिद मरगूब, मुजम्मिल शेख, सुहैल महमूद और जमीर अहमद शेख शामिल थे।
बॉम्बे हाई कोर्ट के इस फैसले से न सिर्फ न्याय प्रक्रिया पर सवाल खड़े हुए हैं, बल्कि यह पीड़ित परिवारों के लिए भी गहरी निराशा लेकर आया है, जो लगभग दो दशकों से न्याय की उम्मीद में थे।





