माओवाद पीड़ितों का विरोध—चिट्ठियों में क्यों आया सुदर्शन रेड्डी का नाम?
बस्तर, सुकमा और दंतेवाड़ा जैसे इलाकों से आए कई ग्रामीणों और माओवाद पीड़ितों ने सांसदों को संबोधित एक पत्र में सुदर्शन रेड्डी का सीधा विरोध किया है। पत्र में कहा गया है कि वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट की जिस बेंच ने सल्वा जुड़ुम को असंवैधानिक करार दिया, उसमें सुदर्शन रेड्डी मुख्य न्यायाधीशों में से एक थे। सल्वा जुड़ुम वह जन आंदोलन था जिसे माओवादियों के खिलाफ स्थानीय युवाओं को सशस्त्र बनाकर खड़ा किया गया था।
पीड़ितों का कहना है कि यदि सल्वा जुड़ुम को वैध माना गया होता, तो कई निर्दोष लोग आज माओवादी हमलों में मारे नहीं जाते। उनके अनुसार, सुदर्शन रेड्डी का फैसला माओवादियों को कानूनी संरक्षण देने जैसा था, जिससे उनकी गतिविधियों को खुला अवसर मिला।
एक पीड़ित ने लिखा, “हमारा पूरा गांव जल गया, मेरे पिता को माओवादियों ने मार डाला, और अब उसी न्यायाधीश को उपराष्ट्रपति बनाने की बात हो रही है। क्या ये न्याय है?”
राजनीतिक तूफान—सुदर्शन रेड्डी पर आरोप और प्रत्यारोप
राजनीतिक गलियारों में यह मुद्दा बेहद गर्म हो गया है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि सुदर्शन रेड्डी का 2011 का फैसला माओवादियों के समर्थन में था। उन्होंने दावा किया कि यदि वह निर्णय नहीं होता, तो माओवाद को भारत से लगभग समाप्त किया जा सकता था।
भाजपा नेताओं ने यह भी कहा कि विपक्ष एक ऐसे व्यक्ति को उपराष्ट्रपति बनाना चाहता है, जिनका रुख देश की आंतरिक सुरक्षा के खिलाफ रहा है। वहीं, कांग्रेस और विपक्षी दलों का तर्क है कि सुदर्शन रेड्डी हमेशा संविधान और मानवाधिकारों की रक्षा करने वाले न्यायाधीश रहे हैं, और उनके फैसले न्यायिक मूल्यों के आधार पर लिए गए थे।
छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री ने भी कहा कि बस्तर की जनता सुदर्शन रेड्डी के उस फैसले को आज भी याद करती है, जिसने उनके सुरक्षा तंत्र को कमजोर कर दिया। उन्होंने कहा कि सल्वा जुड़ुम की समाप्ति के बाद माओवादियों ने फिर से अपने पैर जमाए और ग्रामीण इलाकों में हिंसा बढ़ गई।
वहीं, कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरी बहस संवैधानिक न्याय और जमीनी सुरक्षा के बीच संतुलन की कमी को उजागर करती है। एक ओर संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने वाले जज सुदर्शन रेड्डी हैं, तो दूसरी ओर माओवाद से पीड़ित हजारों परिवार हैं जिनकी पीड़ा वास्तविक और गहरी है।





