करीब डेढ़ दशक तक बंगाल की राजनीति पर मजबूत पकड़ बनाए रखने वाली Mamata Banerjee की पार्टी अब बगावत, दलबदल और असंतोष के दौर से गुजर रही है। चुनाव परिणाम आने के बाद से ही पार्टी के कई नेता और पार्षद खुलकर नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। कई जगहों पर स्थानीय इकाइयों में गुटबाजी भी बढ़ गई है, जिसका असर सीधे संगठन पर दिखाई देने लगा है।
Mamata Banerjee Challenge: अलग-अलग नगरपालिकाओं से इस्तीफों की झड़ी
West Bengal Politics: सबसे ज्यादा झटका TMC को उत्तर 24 परगना और आसपास के इलाकों में लगा है। कई नगरपालिकाओं से सामूहिक इस्तीफे सामने आए हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक भटपारा नगरपालिका से सबसे अधिक 30 पार्षदों ने इस्तीफा दिया है। इसके अलावा गारुलिया से 18, हालिसहार से 16, उत्तर बैरकपुर से 15 और कोंटाई से 14 पार्षदों ने अपने पद छोड़ दिए हैं।
Diamond Harbor नगरपालिका से भी 8 पार्षदों ने सामूहिक रूप से इस्तीफा देकर पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। यह इलाका TMC के लिए बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि यहां से Mamata Banerjee के भतीजे और पार्टी के प्रमुख नेता Abhishek Banerjee सांसद हैं। ऐसे मजबूत गढ़ में पार्टी का कमजोर होना TMC के लिए बड़े राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
भ्रष्टाचार के आरोपों ने बढ़ाई परेशानी
Bengal Political Crisis: TMC के सामने सिर्फ राजनीतिक संकट ही नहीं, बल्कि छवि का संकट भी खड़ा हो गया है। पार्टी के कई स्थानीय नेताओं और पार्षदों पर भ्रष्टाचार, अवैध वसूली और सत्ता के दुरुपयोग जैसे आरोप लगे हैं। इसी सिलसिले में अब तक 17 पार्षदों और स्थानीय नेताओं की गिरफ्तारी भी हो चुकी है।
इन घटनाओं ने विपक्ष को TMC पर हमला बोलने का मौका दे दिया है। विपक्षी दल लगातार आरोप लगा रहे हैं कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण पार्टी के कई नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप बढ़ते गए और अब सत्ता हाथ से निकलने के बाद संगठन बिखरने लगा है।
बूथ स्तर तक कमजोर पड़ने लगी पार्टी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद TMC की सबसे बड़ी चुनौती अपने कैडर और स्थानीय संगठन को बचाए रखना है। लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण पार्टी का बड़ा हिस्सा प्रशासनिक ताकत पर निर्भर हो गया था। लेकिन सरकार बदलने के बाद अब वही संगठन कमजोर होता दिखाई दे रहा है।
कई जिलों में बूथ स्तर के कार्यकर्ता निष्क्रिय हो गए हैं, जबकि कुछ नेताओं पर दूसरे दलों से संपर्क में होने के आरोप भी लग रहे हैं। स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम और असंतोष की स्थिति बनी हुई है। यही वजह है कि लगातार इस्तीफों का सिलसिला रुक नहीं रहा है।
15 साल बाद सत्ता से बाहर हुई TMC
साल 2011 में Mamata Banerjee ने 35 साल पुराने वामपंथी शासन को खत्म कर बंगाल की सत्ता हासिल की थी। उसके बाद लगातार 15 वर्षों तक TMC ने राज्य की राजनीति पर मजबूत पकड़ बनाए रखी। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा और पहली बार राज्य में BJP की सरकार बनी।
इस हार ने न सिर्फ TMC की राजनीतिक ताकत को झटका दिया, बल्कि संगठनात्मक ढांचे को भी प्रभावित किया। सत्ता में रहते हुए पार्टी के साथ जुड़े कई नेता अब भविष्य को लेकर असमंजस में दिखाई दे रहे हैं। यही कारण है कि पार्टी के भीतर टूट और असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है।
ममता बनर्जी ने दिया साफ संदेश
हाल ही में पार्टी नेताओं के साथ हुई एक बैठक में Mamata Banerjee ने साफ शब्दों में कहा था कि जिन्हें पार्टी छोड़नी है, वे छोड़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें किसी के जाने की चिंता नहीं है और वे पार्टी को दोबारा खड़ा करने में सक्षम हैं।
ममता का यह बयान ऐसे समय आया था, जब लगातार इस्तीफों और दलबदल की खबरें सामने आ रही थीं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ममता अब संगठन को नए सिरे से मजबूत करने की कोशिश में जुटी हैं। हालांकि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे जमीनी स्तर पर टूट रहे भरोसे को किस तरह वापस कायम करती हैं।
आने वाले समय में और बढ़ सकती हैं मुश्किलें
फिलहाल TMC जिस दौर से गुजर रही है, उसे पार्टी के लिए सबसे कठिन राजनीतिक चरण माना जा रहा है। लगातार इस्तीफे, भ्रष्टाचार के आरोप और संगठन में बढ़ती नाराजगी आने वाले दिनों में पार्टी की मुश्किलें और बढ़ा सकती हैं।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि Mamata Banerjee और पार्टी नेतृत्व इस संकट से कैसे बाहर निकलते हैं। क्या TMC फिर से अपने संगठन को मजबूत कर पाएगी या फिर बंगाल की राजनीति में उसका प्रभाव लगातार कम होता जाएगा, यह आने वाला समय तय करेगा।
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