SIR प्रक्रिया पर विवाद
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर न्यायिक बिरादरी में बेचैनी का माहौल बन गया है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने एक समारोह में कहा कि लाखों भारतीय नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया 'मनमानी' और 'संविधान के खिलाफ' है। जस्टिस भुइयां की इस टिप्पणी पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश (Ex CJI) जस्टिस बीआर गवई ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें इस मुद्दे पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।
महुआ मोइत्रा, जो तृणमूल कांग्रेस से सांसद हैं, ने जस्टिस गवई के खिलाफ अपने असंतोष को व्यक्त किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक ट्वीट में लिखा, 'मीलॉर्ड! आप चुप रहिए और रिटायरमेंट का आनंद लीजिए। जब गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों की सुनवाई हुई, तब आप चुप थे। इसलिए अब भी चुप रहिए।'
न्यायिक मर्यादा का महत्व
जस्टिस गवई ने न्यायिक मर्यादा के संदर्भ में कहा कि उन्हें ऐसी टिप्पणियाँ करने की अनुमति नहीं है, क्योंकि मामला अदालत में विचाराधीन है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के किसी मौजूदा न्यायाधीश को ऐसे मुद्दों पर बयान नहीं देना चाहिए जो अदालत में सुनवाई के लिए लंबित हों।
इसके अलावा, दिल्ली उच्च न्यायालय के रिटायर्ड जजों जस्टिस एसएन ढींगरा और जस्टिस आरएस सोढ़ी ने भी जस्टिस गवई के विचार का समर्थन किया। उन्होंने जस्टिस भुइयां की टिप्पणियों पर सवाल उठाए और न्यायिक प्रक्रिया के प्रति सम्मान की आवश्यकता पर बल दिया।
सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिकाएं
बता दें कि SIR प्रक्रिया और इससे संबंधित कई अन्य मुद्दों पर याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। इनमें उस नए कानून की वैधता का मामला भी शामिल है, जिसमें चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए समिति से भारत के प्रधान न्यायाधीश को बाहर रखा गया है।
जस्टिस भुइयां को सार्वजनिक मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए जाना जाता है। हाल ही में नालसार विश्वविद्यालय में छात्रों ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में आमंत्रित करने का विरोध किया था। जस्टिस भुइयां ने छात्रों पर गर्व व्यक्त करते हुए कहा कि एक कानून के छात्र को मुखर और साहसी होना चाहिए।





