पूर्व CJI DY चंद्रचूड़ ने बाबरी मस्जिद के बारे में क्या कहा?
क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
चंद्रचूड़ साहब ने जो बातें कहीं वो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बिल्कुल उलट हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2019 में राम मंदिर फैसले में कहा था कि आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट से ये साबित होता है कि विवादित ढांचे के नीचे कोई ऐसा ढांचा था जो इस्लामिक नहीं था, बल्कि हिंदू धार्मिक संरचना से मेल खाता था। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने पूरी ज़मीन रामलला विराजमान यानी भगवान राम के पक्षकार को सौंप दी। और वहाँ राम मंदिर बनाने का अधिकार मान्यता दी। दूसरा कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि अयोध्या में मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ ज़मीन सुन्नी वक्फ बोर्ड को दी जाए। तीसरा कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह एक ट्रस्ट बनाए, जो राम मंदिर का निर्माण और प्रबंधन करेगा। इसी आदेश के तहत बाद में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट बना। और सबसे महत्वपूर्ण, कोर्ट ने कहा कि 1949 में मस्जिद के अंदर रामलला की मूर्तियाँ रखी गईं, जो कानून तोड़ने वाला कदम था। और 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को ढहाना भी अवैध और गैरकानूनी था। DY चंद्रचूड़ इस फैसले को लिखने वाले लोगों में माने जाते हैं। और अब ये कह रहे हैं बाबरी मस्जिद का निर्माण ही मूल रूप से अपवित्र था। ये तो अपने आप में एक विरोधाभास हो गया। जब पहले से ही आपकी मान्यता ये थी तो फिर कैसे उम्मीद की जाए कि आपने फैसला निष्पक्ष तरीके से लिखा होगा। अगर चंद्रचूड साहब की विचारधारा कुछ और थी और मान्यता कुछ और, तो उन्हें इस सुनवाई में शामिल ही नहीं होना था। अगर इतनी मजबूत राय थी तो केस से अलग हो जाते।”
क्या होती है क्यूरेटिव पेटिशन?
जुडिशियल एकेडमी के पूर्व निदेशक प्रोफेसर मोहन जी गोपाल ने क्यूरेटिव पिटीशन दायर करने की भी सलाह दी है। मोहन जी गोपाल का मानना है कि DY चंद्रचूड़ के बयान से से क्यूरेटिव पिटीशन के लिए एक रास्ता खुल गया है। अब आपके मन में सवाल आ रहा होगा आख़िर ये क्यूरेटिव पिटीशन क्या बला है? इसे दायर करने से क्या हो जाएगा? क्यूरेटिव पिटीशन एक स्पेशल पेटिशन है। हालांकि संविधान में क्यूरेटिव पिटीशन के लिए कोई जगह ही नहीं है। उसका प्रोविजन ही नहीं है। ये एक नई अवधारणा है जो साल 2002 में रूपा अशोक बनाम अशोक हुर्रा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्थापित की थी। क्यूरेटिव पिटीशन एक प्रोविजन लाई थी कि जब अंतिम से भी अंतिम सरकार सुप्रीम कोर्ट से आपकी पुनः विचार याचिका भी खारिज हो जाए तो उसके बाद फिर एक रास्ता क्यूरेटिव पटेशन का बनता है। लेकिन उसके लिए बहुत पुख्ता आधार होने चाहिए। बिना पुख्ता आधार के आप क्यूरेटिव पिटीशन के लिए नहीं जा सकते हैं। और क्यूरेटिव पिटीशन की प्रक्रिया भी आसान नहीं है। इसमें याचिकाकर्ता को साबित करना पड़ता है कि फैसले में नेचुरल जस्टिस का उल्लंघन हुआ है। जैसे कि सुनवाई का मौका नहीं मिला या जो फैसला आया है वह पक्षपात पूर्ण है। जब कोई क्यूरेटिव पिटीशन ले जाता है तो उसे सुप्रीम कोर्ट के तीन वरिष्ठ न्यायाधीश पहले सुनते हैं कि यह याचिका विचार करने योग्य है या नहीं है और उसके बाद अगर पेटिशन स्वीकार कर ली जाती है तो फिर जिस बेंच ने इसे स्वीकार किया था वही बेंच इसको दोबारा से सुनती है और उसमें फिर जो फैसला देना होता है वो देती है।
क्यों सुप्रीम कोर्ट का फैसला विवादित माना जाता है?
साल 2019 में जब राम मंदिर का फ़ैसल आया था तो जानकारों ने कहा था कि फैसला तथ्यों और तर्कों पर आधारित नहीं है। भावनाओं की कद्र करने के नाम पर जैसे तैसे विवाद का निबटारा कर दिया गया है। इसके पीछे तर्क थे कि अदालत ने खुद अपने फैसले में माना कि 1949 में बाबरी मस्जिद के अंदर मूर्तियाँ रखना पूरी तरह गैरकानूनी था। इतना ही नहीं, 6 दिसंबर 1992 को जब बाबरी मस्जिद को गिराया गया, तो उसे भी सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी, असंवैधानिक और लोकतंत्र के लिए शर्मनाक माना था। यानी अदालत ने दो-दो बार मान लिया कि कानून को रौंदा गया, नियमों को तोड़ा गया, और ताकत के बल पर अल्पसंख्यक समुदाय से उनका धार्मिक स्थल छीना गया। अगर अदालत ने खुद मान लिया कि दोनों ही घटनाएँ ग़लत थीं, तो फिर न्याय किसके पक्ष में होना चाहिए था? कानून के हिसाब से देखा जाए तो गैरकानूनी काम करने वाले पक्ष को सज़ा मिलनी चाहिए थी, और पीड़ित पक्ष को इंसाफ़। लेकिन हुआ इसका उल्टा।
अदालत ने मुस्लिम पक्ष को सीधे-सीधे कहीं भी “ग़लत” साबित नहीं किया। यहाँ तक कि अदालत ने भी यह भी नहीं कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा ग़लत था। लेकिन इसके बावजूद ज़मीन मुसलमानों से ले ली गई और कहा गया कि “आपको कहीं और 5 एकड़ ज़मीन मिल जाएगी।” यह फैसला क़ानून से ज़्यादा राजनीति देखकर दिया गया ज़्यादा लगता था। 80 और 90 के दशक से मंदिर आंदोलन ने देश में ज़बरदस्त ध्रुवीकरण पैदा किया। लाखों लोगों की भावनाएँ इससे जुड़ गईं। बीजेपी ने इसे अपने राजनीतिक एजेंडे का केंद्र बना दिया। रैलियाँ, नारे, कारसेवा और अंततः बाबरी मस्जिद गिराना इन सबने माहौल ऐसा बना दिया कि समाज दो हिस्सों में बंट चुका था। सत्ता और समाज का दबाव इस फैसले में साफ़ झलकता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में एक और बड़ा विरोधाभास था। अदालत ने माना कि सबूतों से पूरी तरह यह साबित नहीं होता कि बाबरी मस्जिद मंदिर तोड़कर ही बनाई गई थी। केवल विवादित ढांचे के नीचे कोई ऐसा ढांचा था जो इस्लामिक नहीं था, बल्कि हिंदू धार्मिक संरचना के जैसा था। यह फैसला एक तरह की “मिसाल” बन गया। यानी अब देशभर में हर कोई देख रहा है कि अगर बहुसंख्यक आस्था और आंदोलन के नाम पर किसी विवादित स्थल पर दावा कर सकते हैं





