राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के आरके आश्रम और सेंट्रल दिल्ली के इलाकों में चुनाव आयोग के खिलाफ और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों का दमनकारी रूप लगातार बढ़ता जा रहा है। स्थिति यह हो गई है कि अब केवल प्रदर्शनकारियों ही नहीं, बल्कि सड़कों पर सामान्य रूप से घूम रहे नागरिकों और सच दिखाने की कोशिश कर रहे स्वतंत्र पत्रकारों को भी बेरहमी से निशाना बनाया जा रहा है।
राहगीरों और आम नागरिकों पर लाठीचार्ज व मारपीट
पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्स द्वारा केवल विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों को ही नहीं, बल्कि सड़क से गुजरने वाले आम नागरिकों और राहगीरों को भी जबरन डिटेन किया जा रहा है।
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सामान्य रूप से घूम रहे लोगों की पिटाई: कई नागरिकों का आरोप है कि वे किसी भी प्रोटेस्ट का हिस्सा नहीं थे और केवल सामान्य रूप से वहां से गुजर रहे थे, फिर भी पुलिस ने उनके साथ बदसलूकी की, उन्हें घसीटा और लाठी-डंडों से पीटा।
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जबरन हिरासत और फोन छीना जाना: डिटेन किए गए कुछ लोगों के मोबाइल फोन और चाबियाँ तक छीनने की शिकायतें सामने आई हैं। पुलिस का रवैया इतना आक्रामक है कि सड़क पर खड़े होने या दिखने मात्र पर लोगों को उठाकर बसों में ठूसा जा रहा है।
महिला पत्रकारों और मीडियाकर्मियों पर हमला
इस पूरी कार्रवाई का सबसे काला पहलू यह है कि ज़मीन पर सच्चाई दिखाने पहुँची मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारों को भी अपना निशाना बनाया गया:
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प्रेस कार्ड दिखाने के बावजूद डिटेंशन: मौके पर कवरेज कर रही महिला पत्रकारों और मीडियाकर्मियों ने जब अपना प्रेस कार्ड दिखाया और पुलिस से सवाल किए, तो पुलिसकर्मियों ने उनके साथ धक्का-मुक्की की और उन्हें घसीटते हुए हिरासत में ले लिया।
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बैरिकेडिंग और आवाजाही पर कड़े प्रतिबंध: मीडिया को कवरेज करने से रोकने के लिए अचानक नए बैरिकेड्स खड़े कर दिए गए और ड्रोन के जरिए निगरानी बढ़ा दी गई ताकि पुलिसिया ज्यादतियों की कोई भी तस्वीर बाहर न आ सके।
राजधानी में लगातार हो रही इन घटनाओं से यह स्पष्ट हो रहा है कि प्रशासन किसी भी कीमत पर विरोध की आवाज़ और उसकी मीडिया कवरेज को दबाना चाहता है, जिससे देश के लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
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