संसद की कार्यवाही पर चिदंबरम की टिप्पणी
पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने संसद की कार्यवाही में निरंतरता की कमी पर केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि मॉनसून सत्र के दौरान सरकार की जिद के कारण कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं हो सका। चिदंबरम ने कहा कि कई बिल बिना किसी चर्चा के पारित किए गए हैं, जिससे संसद की गरिमा कम हो रही है।
कांग्रेस पार्टी से राज्यसभा सांसद चिदंबरम ने कहा कि वर्तमान स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि विधानसभाओं में होने वाली बहस अधिक प्रभावशाली होती है। उन्होंने अपनी बात को मजबूत करते हुए कहा, 'आजकल जैसे संसद चल रही है, मुझे कभी-कभी लगता है कि मुझे सांसद के बजाय विधायक होना चाहिए था।'
छात्र आंदोलन और संसद की चुप्पी
चिदंबरम ने दिल्ली में छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर भी कोई चर्चा न होने पर आश्चर्य व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर संसद में कोई संवाद नहीं हुआ, जबकि उस समय पुलिस की कार्रवाई की खबरें भी सामने आई थीं, जिसमें एक छात्र की आंख की रोशनी चली गई थी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि संसद का लगातार स्थगन इस विषय पर चर्चा के लिए एक बड़ी बाधा बना हुआ है। चिदंबरम ने कहा कि संसद में कोई भी महत्वपूर्ण मुद्दा अब चर्चा का विषय नहीं रह गया है।
FCRA एक्ट पर चिदंबरम की चिंता
FCRA एक्ट के तहत विदेशी फंडिंग पर निगरानी के लिए प्रस्तावित संशोधनों पर भी चिदंबरम ने सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि इस कानून से उन संस्थाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा जो सामाजिक कार्यों के लिए विदेशों से चंदा प्राप्त करती हैं।
एक कैथोलिक बिशप का उदाहरण देते हुए चिदंबरम ने कहा कि तीन साल पहले उनका FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया गया था और उन्होंने बिशप को अदालत जाने की सलाह दी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कानून मुख्य रूप से ईसाई और मुस्लिम संगठनों को निशाना बनाने के लिए लाया जा रहा है।
सरकार का पक्ष
सरकार के समर्थक इस कानून के पीछे तर्क करते हैं कि कई ट्रस्ट और संगठन धर्म परिवर्तन के कार्य में संलिप्त हैं, और इनकी फंडिंग को रोकने के लिए ही यह अधिनियम लाया गया है। हालांकि, यह बिल अभी संसद में पारित नहीं हुआ है और इसे संसदीय समिति के पास भेजा गया है।





