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पंजाब में भाजपा और अकाली दल का गठबंधन: राजनीतिक उलझनों का विश्लेषण

पंजाब में अगले विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच गठबंधन की संभावनाओं पर चर्चा चल रही है। दोनों दलों के बीच हालात गंभीर रूप से बदल चुके हैं, जिससे इस गठबंधन की राह में कई चुनौतियाँ हैं।

पंजाब में भाजपा और अकाली दल का गठबंधन: राजनीतिक उलझनों का विश्लेषण
फोटो: पंजाब में भाजपा और अकाली दल का गठबंधन: राजनीतिक उलझनों का विश्लेषण

गठबंधन की चर्चाएँ तेज़

पंजाब में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिरोमणि अकाली दल (सद) के बीच संभावित गठबंधन की अटकलें जोर पकड़ रही हैं। भाजपा ने भले ही सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का दावा किया हो, लेकिन पर्दे के पीछे दोनों दलों के बीच उच्च स्तरीय वार्ता चल रही है। सूत्रों के अनुसार सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व में अकाली दल और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के बीच इस मुद्दे पर गहन चर्चा हो रही है।


अकाली दल, जिसने सितंबर 2020 में कृषि कानूनों के खिलाफ एनडीए का साथ छोड़ दिया था, अब पुनर्मिलन की कोशिशों में जुटा है। पार्टी की एकमात्र लोकसभा सांसद हरसिमरत कौर बादल और पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया सहित कई प्रमुख नेता इस गठबंधन की पैरवी कर रहे हैं। हालांकि, यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है कि क्या दोनों दल अपने पुराने राजनीतिक संबंधों को पुनर्जीवित कर सकते हैं।


राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव

एनडीए से अलग होने के बाद, पंजाब का राजनीतिक माहौल तेजी से बदल गया है। 2022 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनावों में दोनों दलों ने अलग-अलग भाग लिया, जिसका परिणाम यह हुआ कि दोनों मुख्यधारा के चुनावों में पीछे रह गए। आम आदमी पार्टी (आप) ने 2022 में बहुमत हासिल किया, जबकि कांग्रेस ने 2024 के चुनावों में सबसे अधिक सीटें जीतीं।


विश्लेषकों का मानना है कि पारंपरिक अकाली-भाजपा गठबंधन एक प्राकृतिक सामाजिक समीकरण था, जिसमें भाजपा शहरी हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी उपस्थिति बनाए रखती थी और अकाली दल ग्रामीण क्षेत्रों में सिखों के वोट को संरक्षित करता था। लेकिन पिछले चार वर्षों में परिस्थितियाँ काफी बदल चुकी हैं।


भाजपा का बढ़ता वोट बैंक

हाल के लोकसभा चुनावों के आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि भाजपा और अकाली दल की राजनीतिक ताकत में बदलाव आया है। भाजपा का वोट शेयर 9 प्रतिशत से बढ़कर 18 प्रतिशत हो गया है, जबकि अकाली दल का वोट शेयर 27 प्रतिशत से घटकर 13 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यह आंकड़े यह दर्शाते हैं कि भाजपा ने अपने वोट बैंक को दोगुना कर लिया है।


भाजपा ने शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी दलित और सिख वोटों में अपनी पैठ बनाई है, जबकि अकाली दल का वोट बैंक आधा रह गया है। इस कारण इस बार बातचीत की मेज पर भाजपा का पलड़ा भारी दिख रहा है।


चुनौतियाँ और संभावनाएँ

आकाली दल इस समय व्यापक राजनीतिक दबाव का सामना कर रहा है। अमृतपाल सिंह के नेतृत्व में 'वारिस पंजाब दे' और अन्य अकाली गुट उसके पंथिक वोट बैंक में सेंध लगा रहे हैं। इसके साथ ही, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस भी अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटी हुई हैं। ऐसे में अकाली दल भाजपा के साथ एक मजबूत गठबंधन की तलाश कर रहा है।


हालांकि, अंदरूनी मतभेद भी हैं। कुछ अकाली नेता मानते हैं कि वर्तमान भाजपा, अटल बिहारी वाजपेयी या लालकृष्ण आडवाणी के समय की भाजपा नहीं है। भाजपा अब सिख बहुल सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रही है, जिससे अकाली दल के लिए स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है।