‘जेल से सरकार नहीं चल सकती’—अमित शाह का नैतिक बचाव
अमित शाह ने लोकसभा में तीन विधेयकों—संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025, केंद्रशासित प्रदेश राज (संशोधन) विधेयक, और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक—की पैरवी करते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी नेता को गंभीर आपराधिक आरोपों में गिरफ्तार होने के बाद 30 दिनों से ज्यादा जेल में रहने पर पद बनाए रखना लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “सरकार जेल से नहीं चलाई जा सकती,” और यह व्यवस्था इसलिए जरूरी है क्योंकि संविधान में इस बात की स्पष्टता नहीं थी।
अमित शाह ने विशेष रूप से दिल्ली और तमिलनाडु के हाल के मामलों का ज़िक्र किया, जहां कुछ नेता गिरफ्तार होते हुए भी लंबे समय तक सत्ता बनाए रखते रहे। उनका कहना था कि यह व्यवस्था सिर्फ पाबंदी नहीं, बल्कि राजनीति में नैतिकता बहाल करने का प्रयास है।
‘कांग्रेस का दोहरा चरित्र’—झूठे आरोप और नैतिकता की कहानी
विधेयक का बचाव करते हुए अमित शाह ने कांग्रेस पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने याद दिलाया कि उन्हें कांग्रेस ने पहले भी “फर्जी मामले में फंसाया था”—सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में । इसके बावजूद उन्होंने गिरफ्तारी से पहले इस्तीफा दे दिया और पूर्ण निर्दोष होने तक किसी संवैधानिक पद पर नहीं रहे।
अमित शाह ने यह भी कहा कि कांग्रेस की नैतिकता की धज्जियां पहले भी बिखरी हैं—जैसे लालू प्रसाद यादव के समर्थन में अध्यादेश लाना, जो राहुल गांधी ने पहले विरोध किया और बाद में गले लगाया। उन्होंने इंदिरा गांधी के 39वें संशोधन का उदाहरण भी दिया, जिससे प्रधानमंत्री को न्यायिक प्रक्रिया से छूट मिली थी, और कांग्रेस की नीति इस तरह की बाहरी स्थिति की ओर इशारा करती रही।





