सूत्रों के मुताबिक, सपा ने IPAC को केवल ढाई महीने पहले ही 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए काम सौंपा था। IPAC का काम विशेष तौर पर उन सीटों पर ध्यान केंद्रित करना था, जहां पिछली बार सपा को कम अंतर से हार का सामना करना पड़ा था। इन सीटों को जीत में बदलने के लिए ‘माइक्रो टारगेटिंग’ जैसी रणनीतियों को लागू किया जाना था। इसके अलावा, सोशल मीडिया और प्रचार अभियान की जिम्मेदारी शो टाइम कंपनी के पास थी।
पश्चिम बंगाल के चुनावों का असर
Akhilesh Yadav decision: पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुए चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की जीत ने न सिर्फ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सत्ता में बनाए रखा, बल्कि यूपी के सपा नेतृत्व को भी सोचने पर मजबूर कर दिया। अखिलेश यादव का फैसला था कि IPAC को काम देने का निर्णय ममता बनर्जी की सलाह पर किया जाए, लेकिन पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में हुई हार ने सपा के लिए यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या बाहरी एजेंसियों पर भरोसा करना सही रणनीति है।
ED की कार्रवाई ने बढ़ाया जोखिम
Akhilesh Yadav decision: अखिलेश यादव के करीबी सूत्रों का कहना है कि बंगाल चुनाव के दौरान IPAC से जुड़े मामलों में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच और छापों ने सपा नेतृत्व को सतर्क कर दिया। चुनावी डेटा और रणनीति से जुड़े संवेदनशील दस्तावेज कहीं लीक न हो जाए, इसलिए बाहरी एजेंसियों से दूरी बनाने का यह अखिलेश यादव का फैसला था।
सपा ने जोखिम कम करने के लिए समय रहते IPAC के साथ अपने करार को समाप्त करना ही बेहतर समझा। यही कारण है कि चुनावी रणनीति केवल ढाई महीने में बदल गई।
स्थानीय समझ और टीम की भूमिका
IPAC contract scrapped: IPAC की टीम का अधिकांश हिस्सा उत्तर प्रदेश के बाहर से काम कर रही थी, जिससे स्थानीय राजनीति और जमीन पर पकड़ को लेकर सवाल उठ रहे थे। सपा अब अपनी ‘इन-हाउस’ टीम और स्थानीय नेताओं पर ज्यादा भरोसा करेगी। चुनावी सर्वे और डिजिटल प्रचार के लिए छोटी टीमों को जिम्मेदारी दी जा सकती है।
शो टाइम कंपनी पहले से ही सोशल मीडिया और प्रचार अभियान की जिम्मेदारी संभाल रही है, और अब इसका रोल और बढ़ सकता है। इस कदम के साथ, सपा ने बाहरी रणनीतिकारों पर भरोसा कम करने और अपने संगठन और स्थानीय नेतृत्व पर जोर देने का संदेश दिया है।
अब चुनावी मोर्चा कौन संभालेगा?
Bengal polls controversy: IPAC के बाहर होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि सपा की चुनावी नैया कौन पार करेगा। फिलहाल, पार्टी का रुख साफ है कि चुनावी मोर्चा अब मुख्य रूप से स्थानीय नेताओं और इन-हाउस टीम के जिम्मे होगा।
चुनावी रणनीति में बदलाव के बावजूद शो टाइम की भूमिका बरकरार रहेगी। सोशल मीडिया और प्रचार अभियान के अलावा, सीट-विशेष रणनीतियों के लिए अब छोटे, लक्षित टीमों को काम सौंपा जा सकता है। यह बदलाव सपा के लिए जोखिम कम करने और नियंत्रण बनाए रखने की दिशा में एक कदम है।
2027 का विधानसभा चुनाव सपा के लिए ‘करो या मरो’ जैसा है। IPAC के बाहर होने और स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा बढ़ाने के साथ, पार्टी ने अपनी चुनावी रणनीति को पूरी तरह से पुनःसंरचित कर लिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस नई रणनीति के साथ सपा उत्तर प्रदेश में अपने विरोधियों को कैसे चुनौती देती है।
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