कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीशों को यह समझना होगा कि उनका न्यायिक आउटपुट केवल उनके निर्णयों से नहीं, बल्कि उनकी कार्यसंस्कृति से भी जुड़ा होता है। पीठ ने कहा, "हमें यह देखने की जरूरत है कि हम कैसा परफॉर्म कर रहे हैं, और न्यायिक प्रक्रिया में लोगों का विश्वास कैसे कायम रखा जाए। यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें झारखंड के चार आजीवन कारावास की सजा पाए अभियुक्तों ने आरोप लगाया था कि उनकी आपराधिक अपीलों पर झारखंड हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी हो चुकी है, लेकिन फैसले दो से तीन वर्षों तक सुरक्षित रखे गए।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि वे अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से ताल्लुक रखते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इसे न्याय में देरी का गंभीर उदाहरण बताते हुए कहा कि ऐसी स्थिति न्यायिक व्यवस्था में लोगों का विश्वास कमजोर कर सकती है। पीठ ने कहा, "इस तरह की याचिकाएं बार-बार दाखिल न हों, इसके लिए दिशानिर्देश तय किए जाने चाहिए।
5 मई को हुई पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया गया था कि चारों मामलों में अब निर्णय सुना दिया गया है। इनमें से तीन मामलों में दोषियों की अपीलें स्वीकार कर ली गई हैं, जबकि चौथा मामला मतभेद के कारण दूसरी पीठ को भेजा गया है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस याचिका के जरिए जो मसला उठाया गया है, वह केवल इन चार अभियुक्तों तक सीमित नहीं है। कोर्ट ने संकेत दिया कि वह जल्द ही इस विषय पर व्यापक निर्देश जारी कर सकता है।





