महाराष्ट्र सरकार द्वारा सितंबर के आखिरी हफ्ते में जारी नोटिफिकेशन के अनुसार, राज्य के 265 तालुकाओं (लगभग तीन-चौथाई हिस्से) को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। इनमें 'संत्रा नगरी' के नाम से मशहूर नागपुर जिला सूखे की सबसे गंभीर मार झेल रहा है, जहां के सभी 14 तालुका पूरी तरह प्रभावित हैं। पानी की भारी कमी और मानसून में 30 से 40 प्रतिशत की गिरावट के चलते किसानों की स्थिति बेहद दयनीय हो गई है।
संतरे और अन्य फसलों को भारी नुकसान नागपुर में संतरे की पैदावार को सबसे बड़ा झटका लगा है। किसानों के अनुसार, पिछले साल जहां एक बगीचे से 64 टन तक संतरा निकलता था, वहीं इस साल घटकर केवल 1 से 1.5 टन या उससे भी कम रह गया है। तापमान अधिक होने और पर्याप्त पानी न मिलने के कारण पेड़ों पर कीटों (थ्रिप्स और माइट्स) का प्रकोप बढ़ गया है, जिससे फल गल रहे हैं और उनकी क्वालिटी बेहद खराब हो चुकी है। संतरे के अलावा सोयाबीन, कपास (कपास), तूर और बैंगन जैसी अन्य फसलें भी बर्बाद हो चुकी हैं।
लागत निकलना भी हुआ मुश्किल किसानों ने बताया कि एक हेक्टेयर संतरा उगाने में कम से कम 1 से 1.25 लाख रुपये तक की लागत आती है। वहीं कपास और सोयाबीन जैसी फसलों में भी हजारों रुपये खर्च हो चुके हैं। स्थिति यह है कि फसल खराब होने और पैदावार न के बराबर होने के कारण किसान अपनी लागत तक वसूल नहीं पा रहे हैं। यहाँ तक कि तोड़ने की मजदूरी (लगभग 700 रुपये) और खाद-पानी का खर्च निकालने में असमर्थ होकर कुछ किसानों को अपने परिवार का गुजर-बसर करने और मजदूरों को पैसे देने के लिए अपनी गायें तक बेचनी पड़ी हैं।
भूजल स्तर में भारी गिरावट और भविष्य का संकट कुओं का जलस्तर जो आमतौर पर अप्रैल-मई में गिरता है, वह इस समय (सितंबर-अक्टूबर में ही) गर्मियों जैसा नीचे चला गया है। किसानों का कहना है कि आने वाले फरवरी से जून के चार महीनों में इन पेड़ों को बचाना बेहद कठिन होगा, क्योंकि यदि पेड़ सूख गए तो संतरे के नए बागों को तैयार होने में 20 से 25 साल का समय लग जाएगा। आने वाले 3 साल तक इस सूखे का असर खेती पर बना रहेगा।
सरकारी मदद और बीमा योजना पर किसानों का असंतोष सरकार ने भले ही तालुकाओं को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है, लेकिन जमीनी स्तर पर किसानों को कोई राहत नहीं मिली है। किसानों ने फसल बीमा (पीक बीमा) के नियमों पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह प्रणाली ऐसी है जैसे बाइक चलते-चलते केवल हेडलाइट टूटने पर ही बीमा मिलना। इसके अलावा, यदि सरकार सहायता देती भी है तो वह केवल सीमित हेक्टेयर (जैसे 5 में से 2 हेक्टेयर) पर लागू होती है, जिससे पूरा नुकसान कवर नहीं होता।
किसानों की मांग है कि सरकार मुआवजा देने के साथ-साथ विशेष रूप से मनरेगा या अन्य योजनाओं के माध्यम से ड्रिप सिंचाई, पानी और लेबर खर्च के लिए सीधी सब्सिडी दे ताकि इन बहुवर्षीय पेड़ों और किसानों की आजीविका को बचाया जा सके।
इस पूरी खबर को वीडियो फॉर्मेट में देखिए के लिए, क्लिक करें नीचे दिए गए लिंक पर - https://youtu.be/CzcmW3Ha2dw?si=u4jOLA2cNG0NdIag





