तमिलनाडु ने संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत यह याचिका दाखिल की है, जो राज्य सरकारों को केंद्र के खिलाफ कानूनी या संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन पर सीधे सुप्रीम कोर्ट में जाने की अनुमति देता है। याचिका में केंद्र सरकार से समग्र शिक्षा योजना के तहत लंबित 2,151.59 करोड़ रुपये की राशि तत्काल जारी करने और 6% वार्षिक ब्याज समेत कुल 2,291.30 करोड़ रुपये देने की मांग की गई है।
तमिलनाडु सरकार का कहना है कि 16 फरवरी, 2024 को परियोजना अनुमोदन बोर्ड (Project Approval Board) ने राज्य के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी और सभी दिशा-निर्देशों के अनुपालन को स्वीकार कर लिया गया था। इसके बावजूद, 21 मई, 2025 तक एक भी रुपया जारी नहीं किया गया।
राज्य ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार पीएम श्री योजना और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 को लागू करने के लिए शिक्षा निधि को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है, जबकि ये केवल नीति दस्तावेज हैं, न कि कोई कानून। तमिलनाडु ने कहा कि किसी राज्य को एनईपी थोपना संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों का उल्लंघन है। तमिलनाडु सरकार ने पहले ही एनईपी 2020 और उसके तीन-भाषा फार्मूले का विरोध किया है, जिसमें हिंदी को शामिल किया गया है। यह मुद्दा राज्य में राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है। सुप्रीम कोर्ट भी पहले कह चुका है कि किसी राज्य को एनईपी अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत नहीं आता।
राज्य सरकार ने केंद्र पर शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन न करने का आरोप लगाया है। अधिनियम के अनुसार, केंद्र को समग्र शिक्षा योजना के तहत शिक्षा खर्च का 60% वहन करना होता है।
तमिलनाडु ने 6 जुलाई, 2024 को केंद्र से पीएम श्री योजना के समझौता ज्ञापन (MoU) में उन शर्तों को हटाने का अनुरोध किया था, जिनके तहत एनईपी प्रावधानों को लागू करना अनिवार्य है। लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकला। राज्य ने 23 फरवरी और 7 मार्च, 2024 को केंद्र द्वारा भेजे गए पत्रों को भी चुनौती दी है, जिनमें कथित तौर पर एनईपी और पीएम श्री योजना के अनुपालन को फंड जारी करने से जोड़ा गया था। तमिलनाडु सरकार ने इन पत्रों को असंवैधानिक, मनमाना और संघीय ढांचे के विरुद्ध बताया है।





