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गैर-जाट ध्रुवीकरण से लेकर विपक्ष का बिखराव तक रहा कांग्रेस की हार का कारण, हारती बाज़ी जीत गयी बीजेपी

प्रदेश में बीजेपी के ख़िलाफ़ मतों की लहर होने पर भी पार्टी ने 2019 के विधानसभा चुनाव परिणामों से ज्यादा सीटें जीत ली। 2019 में बीजेपी ने 40 सीटों पर जीत दर्ज की थी, पार्टी को जेजेपी और निर्दलीय उम्मीदवारों के साथ गठबंधन कर सरकारी बनानी पड़ी थी।

गैर-जाट ध्रुवीकरण से लेकर विपक्ष का बिखराव तक रहा कांग्रेस की हार का कारण, हारती बाज़ी जीत गयी बीजेपी
फोटो: गैर-जाट ध्रुवीकरण से लेकर विपक्ष का बिखराव तक रहा कांग्रेस की हार का कारण, हारती बाज़ी जीत गयी बीजेपी
हरियाणा के चुनाव परिणामों ने सभी को चौंका दिया है। एग्ज़िट पोल से लेकर शुरुआती रुझानों को पूरी तरह उलटते हुए बीजेपी ने एक बार सत्ता पाने में कामयाबी पायी है। बीजेपी विधानसभा की 90 सीटों में से 48 सीटों पर जीत हासिल कर अपने दम पर सरकार बनाने जा रही है।  चुनाव में माहौल बीजेपी के ख़िलाफ़ होने के बावजूद कांग्रेस मात्र 37 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी। परिणामों ने साफ़ कर दिया है कि कांग्रेस कई मोर्चों पर कमज़ोर रही, जिसकी वजह से इसका सीधा फ़ायदा बीजेपी और अन्य उम्मीदवारों को हुआ। इनमें ग़ैर-जाट वोटों का ध्रुवीकरण, उम्मीदवारों का चयन, पार्टी की आंतरिक कलह, बिखरा हुआ विपक्ष और चुनावी रणनीति शामिल है।

स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषकों से लेकर कई लोग हैरान है कि प्रदेश में बीजेपी के ख़िलाफ़ मतों की लहर होने पर भी पार्टी ने 2019 के विधानसभा चुनाव परिणामों से ज्यादा सीटें जीत ली। 2019 में बीजेपी ने 40 सीटों पर जीत दर्ज की थी, पार्टी को जेजेपी और निर्दलीय उम्मीदवारों के साथ गठबंधन कर सरकारी बनानी पड़ी थी।

कांग्रेस हार की वज़ह

कांग्रेस प्रदेश में ग़ैर-जाट समुदाय के वोटरों को अपने पक्ष में नहीं कर सकी। बीजेपी ने पंजाबी और ओबीसी वर्ग के वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिए कोई कमी नहीं छोड़ी। बीजेपी ने ओबीसी वोट पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित किया, जो कि आबादी का लगभग 40 प्रतिशत है। इस साल मार्च में मनोहर लाल खट्टर की जग़ह नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री बना देना, ओबीसी वर्ग के वोटरों को साधने की रणनीति का  हिस्सा था। चुनाव प्रचार में बीजेपी ने नायब को मुख्यमंत्री चेहरा बता कर इसे और बल दिया।

हरियाणा में अक्सर मुख्यमंत्री जाट समुदाय से चुने जाते रहे हैं। जबकि प्रदेश में इनकी आबादी महज़ 25 प्रतिशत है। भाजपा ने 75 प्रतिशत गैर-जाट मतदाताओं को लुभाकर अपनी जीत पक्की कर ली। इसके अलावा, भाजपा ने अनुसूचित जाति (एससी) के मतदाताओं को भी साधा। प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में महिला स्वयं सहायता समूह के माध्यम से बीजेपी  दलितों में जगह बनाने में सफ़ल रही।

आलोचकों का कहना है कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा ने अपने ख़ेमे के नेताओं को उम्मीदवार बनाने पर ज़्यादा ज़ोर दिया।कांग्रेस ने अपने प्रदेश अध्यक्ष उदयभान सहित ऐसे 17 उम्मीदवारों को फिर से टिकट दिया, जो पहले हार गए थे। वहीं, भाजपा ने एक अलग दृष्टिकोण अपनाया। सत्ता विरोधी भावना से निपटने के लिए 60 नए चेहरे चुनाव के मैदान में उतारे। पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री खट्टर को प्रचार से दूर रखा, क्योंकि उनपर घमंडी होने के आरोप लग रहे थे। भाजपा ने इसके जवाब में अधिक मिलनसार नायब सिंह सैनी को मैदान में उतारा।

बीजेपी ने इस साल के जनवरी से ही प्रदेश के कोने-कोने में जाकर सरकारी योजनाओं का प्रचार करना शुरू कर दिया था। लोगों को भरोसा दिलाया गया कि बीजेपी सरकार उनकी समस्याओं का समाधान कर देगी। जनवरी के बाद से कल्याणकारी योजनाओं की झड़ी लगा दी गई। इधर, इण्डिया गठबंधन और विपक्ष बिलकुल बिखरा हुआ रहा। लोकसभा चुनावों के विपरीत विधानसभा मुकाबले में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी अलग-अलग लड़े। भारतीय राष्ट्रीय लोकदल ने बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया था। जेजेपी ने आज़ाद समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया था। कई दमदार उम्मीदवार निर्दलय मैदान में उतरे, जिससे बीजेपी के विरोध में पड़ने वाले वोट बँट गए।

बीजेपी ने पूरी ताक़त के साथ 150 से ज़्यादा रैलियां कीं। जबकि कांग्रेस ने लगभग 70 रैलियां ही की। विश्लेषकों का मानना है कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार में सिर्फ़ किसानों पर ध्यान केंद्रित किया। राहुल ने अंबानी और अडानी जैसे उद्योगपतियों पर कई बार निशाना साधा, जिससे शायद व्यापारी वर्ग खुश नज़र नहीं आया। चुनाव बीत जाने के बाद भी कांग्रेस में आंतरिक कलह जारी रही। सिरसा से सांसद कुमारी सैलजा और भूपिंदर हुड्डा के बीच की कलह ने दलितों के बीच पार्टी के ख़िलाफ़ के सन्देश को जन्म दिया। कुमारी सैलजा दलितों की एक बड़ी नेता है।