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उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को राहत नहीं, दिल्ली दंगे के साज़िश मामले में हाईकोर्ट का आदेश

दिल्ली दंगे की बड़ी साज़िश मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने पूर्व JNU छात्र उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की ज़मानत याचिकाएं ख़ारिज कर दी हैं। जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस दिनेश भट्ट की पीठ ने साफ़ किया कि शीर्ष अदालत के आदेश में संशोधन नहीं किया जा सकता।

उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को राहत नहीं, दिल्ली दंगे के साज़िश मामले में हाईकोर्ट का आदेश
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नई दिल्ली: साल 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साज़िश से जुड़े मामले (UAPA) में पूर्व JNU छात्र उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को बड़ा झटका लगा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों को नियमित ज़मानत देने से इनकार करते हुए उनकी याचिकाओं को ख़ारिज कर दिया है। हाईकोर्ट की डबल बेंच ने स्पष्ट किया कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही ज़मानत पर शर्तें तय कर चुका है, तब उसमें संशोधन करना उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

यह आदेश जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस दिनेश भट्ट की पीठ द्वारा पारित किया गया। पीठ ने निकला अदालत (ट्रायल कोर्ट) के 4 जुलाई के फ़ैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि याचिका में कोई आधार नहीं पाया गया। यह लगातार तीसरा मौका है जब दिल्ली हाईकोर्ट ने इन दोनों प्रमुख आरोपियों की राहत याचिका ख़ारिज की है।

हाईकोर्ट ने क्यों ख़ारिज की राहत?

हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य मुद्दा यह था कि क्या सुप्रीम कोर्ट के पहले दिए गए निर्देशों के होते हुए हाईकोर्ट ज़मानत दे सकता है या नहीं।

  1. सुप्रीम कोर्ट का जनवरी 2026 का आदेश: शीर्ष अदालत ने जनवरी 2026 में ख़ालिद और इमाम की ज़मानत अर्जी ख़ारिज करते समय यह निर्देश दिया था कि वे एक साल (यानी जनवरी 2027) बीतने के बाद या मामले के मुख्य संरक्षित गवाहों (Protected Witnesses) के बयान दर्ज होने के बाद ही दोबारा ज़मानत की मांग कर सकते हैं।

  2. शर्तों का पालन अधूरा: हाईकोर्ट ने नोट किया कि न तो एक साल की अवधि पूरी हुई है और न ही संरक्षित गवाहों की गवाही की प्रक्रिया पूरी हुई है। ऐसे में इस मोड़ पर ज़मानत देना सुप्रीम कोर्ट के आदेश में संशोधन करने जैसा होगा, जो न्यायिक नियमों के विपरीत है।

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष (आरोपियों) और राज्य/अभियोजन पक्ष के बीच ज़मानत की मुख्य वजहों पर तीखी बहस देखने को मिली:

बचाव पक्ष की दलीलें:

  • समानता (Parity) और देरी का हवाला: उमर ख़ालिद की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रदीप पाइस ने दलील दी कि इस मामले में कुल 18 आरोपी हैं और उनमें से ज़्यादातर को अदालत से ज़मानत मिल चुकी है। उन्होंने मुकदमे (Trial) में हो रही देरी को ज़मानत का मुख्य आधार बताया।

  • परिस्थितियों में बदलाव: शरजील इमाम की ओर से वकील तालिब मुस्तफ़ा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने बिना किसी प्रगति के लंबी हिरासत को ज़मानत का आधार माना है। इसके अलावा, सैयद इफ़्तिख़ार अंद्राबी मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फ़ैसले का हवाला देकर दलील दी गई कि परिस्थितियों में बदलाव (Change of Circumstances) आया है।

अभियोजन पक्ष (पुलिस) का पलटवार:

  • समानता का नियम लागू नहीं: दिल्ली पुलिस और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने कड़ा विरोध करते हुए कहा कि उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की भूमिका (Role) ज़मानत पर बाहर आए अन्य सह-आरोपियों से बिल्कुल अलग और गंभीर है। इसलिए वे समानता का दावा नहीं कर सकते।

  • सुप्रीम कोर्ट के निर्देश सर्वोच्च: अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि किसी दूसरे मामले में कोऑर्डिनेट बेंच का फ़ैसला, सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस विशिष्ट मामले में दिए गए स्पष्ट निर्देशों को निष्प्रभावी या रद्द नहीं कर सकता।

अगला कानूनी रास्ता

हाईकोर्ट से अर्जी ख़ारिज होने के बाद अब दोनों आरोपियों के पास सुप्रीम कोर्ट का रुख करने या शीर्ष अदालत द्वारा तय सीमा के पूरा होने का इंतज़ार करने का विकल्प ही बाकी रह गया है।