लोकतंत्र, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर देश में जारी बहस के बीच राजनीतिक आंदोलनों को विदेशी प्रभाव से जोड़ने के आरोपों पर भी सवाल उठ रहे हैं। ‘थर्ड आई’ कार्यक्रम में पत्रकार पंकज श्रीवास्तव ने एक विस्तृत बातचीत में SIR, कथित वोट चोरी, चुनाव आयोग की जवाबदेही, जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शनों और युवाओं की भूमिका पर अपनी राय रखी। बातचीत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), मोहन भागवत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी और छात्र नेता नेहा बोरा से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई।
SIR प्रक्रिया और चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल
चर्चा में दावा किया गया कि SIR प्रक्रिया के दौरान करीब 13 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का आंकड़ा सामने आया है। वक्ता के मुताबिक, इनमें कुछ मतदाता मृत या स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके हो सकते हैं, लेकिन शेष नामों को हटाने के कारणों और प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटने के मामलों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
बातचीत में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून और 2023 में पारित उस कानून पर भी सवाल उठाए गए, जिसके तहत चुनाव आयुक्तों को आधिकारिक कार्यों के संबंध में कानूनी संरक्षण मिला। वक्ता ने नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार के प्रभाव और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर और नामों में वर्तनी संबंधी विसंगतियों के कारण मतदाताओं के नाम हटने का खतरा बढ़ सकता है।
उन्होंने चुनाव आयोग से SIR प्रक्रिया और संबंधित सॉफ्टवेयर का स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग की। साथ ही, मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मामलों में प्रभावित लोगों को उचित सुनवाई और अपील का अवसर देने की आवश्यकता पर जोर दिया।
विदेशी फंडिंग और पश्चिमी आंदोलनों की चर्चा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत द्वारा पश्चिमी देशों में चल रहे आंदोलनों के प्रभाव का उल्लेख किए जाने के संदर्भ में चर्चा हुई कि भारत में विरोध प्रदर्शनों को विदेशी फंडिंग से जोड़ने के लिए ठोस प्रमाण जरूरी हैं। वक्ता ने कहा कि शिक्षा, बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे दुनिया के कई देशों में आंदोलनों की वजह बने हैं।
फ्रांस, ग्रीस, अल्बानिया और अन्य देशों के आंदोलनों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि युवाओं और आम नागरिकों के असंतोष को केवल विदेशी हस्तक्षेप के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि शिक्षा और रोजगार की समस्याएं भारत में भी गंभीर हैं। बातचीत में स्कूलों के बंद होने और शिक्षकों की कमी जैसे मुद्दे भी उठाए गए।
विदेशी फंडिंग के आरोपों पर वक्ता ने RSS से जुड़े कुछ संगठनों और अमेरिकी फाउंडेशन से संबंधित खबरों का हवाला देते हुए सवाल किया कि यदि किसी संगठन को विदेश से धन मिलने पर आपत्ति है, तो जांच के नियम सभी पर समान रूप से लागू होने चाहिए। हालांकि, बातचीत में लगाए गए इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि प्रस्तुत नहीं की गई।
नेहा बोरा और विचारों से प्रेरणा लेने का मुद्दा
छात्र नेता नेहा बोरा पर बांग्लादेश के आंदोलनों से प्रेरित होने को लेकर लगाए गए आरोपों पर वक्ता ने सफाई दी कि किसी आंदोलन से प्रेरणा लेने का अर्थ उसके सभी तरीकों का समर्थन करना नहीं होता। उनके अनुसार, नेहा बोरा ने बांग्लादेश के एक समाजवादी छात्र संगठन के कार्यक्रम के लिए संदेश में वहां के युवाओं के संघर्ष से प्रेरणा लेने की बात कही थी।
इस संदर्भ में भगत सिंह और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विदेशी विचारधाराओं तथा फ्रांसीसी क्रांति से प्रभावित होने के उदाहरण दिए गए। वक्ता ने कहा कि विचारों का अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है। उन्होंने RSS की विचारधारा और उसके शुरुआती वैचारिक संदर्भों पर भी सवाल उठाए तथा एम.एस. गोलवलकर की पुस्तक और बी.एस. मुंजे की इटली यात्रा का उल्लेख किया।
आंदोलन, सत्ता परिवर्तन और लोकतांत्रिक अधिकार
बातचीत में वक्ता ने कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से सरकार बदलने की मांग करना अपने आप में अपराध नहीं है। उन्होंने 1975 के आपातकाल, जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन और 2013 के आसपास नरेंद्र मोदी द्वारा तत्कालीन दिल्ली सरकार को हटाने संबंधी राजनीतिक अपीलों का उल्लेख किया। उनके अनुसार, चुनाव के जरिए सत्ता परिवर्तन भारतीय लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन स्थल को लेकर विवाद, प्रदर्शनकारियों की हिरासत और तिरंगा फहराने के मामलों पर भी सवाल उठाए गए। वक्ता ने आरोप लगाया कि विरोध प्रदर्शनों को सीमित करने और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने से नागरिकों के अभिव्यक्ति तथा शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने मौजूदा परिस्थितियों को अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति बताते हुए मीडिया की स्वतंत्रता और संस्थागत जवाबदेही पर चिंता जताई।
युवा आंदोलन, विपक्ष और आगे की राह
चर्चा में NEET विवाद, छात्र आंदोलनों और युवाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी का भी उल्लेख हुआ। वक्ता के मुताबिक, शिक्षा, रोजगार और चुनावी पारदर्शिता जैसे मुद्दे अलग-अलग वर्गों को एक साथ ला सकते हैं। उन्होंने राहुल गांधी और विपक्ष की ओर से चुनाव आयोग की जवाबदेही तथा मतदाता सूची की पारदर्शिता को लेकर उठाए गए सवालों का जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि सरकार को विरोध प्रदर्शनों को विदेशी साजिश या अराजकता बताने के बजाय उठाए गए सवालों का जवाब देना चाहिए। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों की जांच और नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा को लोकतंत्र के लिए जरूरी बताया गया।
बातचीत के अंत में वक्ता ने कहा कि युवाओं का राजनीतिक जागरूक होना और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। उन्होंने SIR प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच, संबंधित सॉफ्टवेयर के ऑडिट और चुनाव आयोग की जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग दोहराई। कार्यक्रम में व्यक्त विचारों और आरोपों की स्वतंत्र जांच तथा संबंधित पक्षों के जवाब लोकतांत्रिक बहस को तथ्यपरक बनाने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
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