युद्ध की आंच और अमेरिकी तेल कंपनियों का बंपर मुनाफा मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में भारी उछाल आया है। न्यूयॉर्क टाइम्स और एनपीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका की 50 से अधिक बड़ी ऑयल और गैस कंपनियों ने केवल 6 महीनों में 100 बिलियन डॉलर (लगभग ₹11 लाख करोड़) से अधिक का रिकॉर्ड मुनाफा दर्ज किया है। पिछले साल इसी अवधि में यह कमाई 47 बिलियन डॉलर के आसपास थी। एग्जोन मोबिल और शेवरॉन जैसी दिग्गज कंपनियों का मुनाफा दो से तीन गुना तक बढ़ चुका है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने और रिफाइनिंग मार्जिन बढ़ने का सीधा फायदा इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मिला है।
आम जनता पर बढ़ा महंगाई का आर्थिक बोझ एक तरफ जहां तेल कंपनियां रोजाना औसतन ₹6,970 करोड़ का मुनाफा कमा रही हैं, वहीं आम नागरिक इसकी भारी कीमत चुका रहे हैं। अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें रिकॉर्ड $4 प्रति गैलन के पार पहुंच गईं, जिससे प्रत्येक अमेरिकी परिवार पर औसतन $1,100 (लगभग ₹92,000) का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा है। इसके बावजूद, कंपनियों द्वारा इस मुनाफे का बड़ा हिस्सा नए उत्पादन में लगाने के बजाय शेयर बायबैक और डिविडेंड के रूप में निवेशकों को दिया जा रहा है। अमेरिका में विपक्षी डेमोक्रेट्स ने इस अप्रत्याशित कमाई पर 'विंडफॉल टैक्स' लगाने की मांग तेज कर दी है।
भारत की अर्थव्यवस्था और रिफाइनरीज पर असर भारत अपनी आवश्यकता का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। कच्चे तेल की कीमत में हर $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी भारत का सालाना व्यापार घाटा करीब $12.5 बिलियन (₹1.05 लाख करोड़) बढ़ा देती है। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया गिरकर 95 के निचले स्तर तक पहुंचने से आयात और महंगा हो गया है। इसके साथ ही खाद सब्सिडी का खर्च ₹2.5 लाख करोड़ पार करने का अनुमान है। दूसरी ओर, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की जामनगर स्थित रिलायंस रिफाइनरी यात्रा यह दर्शाती है कि पश्चिमी देश अपनी तेल आवश्यकताओं और वेनेजुएला के क्रूड को प्रोसेस करने के लिए भारतीय रिफाइनिंग क्षमता का उपयोग करना चाहते हैं।
वैश्विक कूटनीति और अनसुलझे सवाल सऊदी अरब और रूस (ओपेक प्लस) द्वारा उत्पादन बढ़ाने की योजना टालने से वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति सामान्य होने की संभावना फिलहाल ठंडे बस्ते में चली गई है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब वैश्विक संघर्षों की वजह से विकासशील देश महंगाई, गिरती मुद्रा और बढ़ते व्यापार घाटे की मार झेल रहे हैं, तब क्या केवल मुट्ठी भर कॉर्पोरेट घरानों के मुनाफे के लिए दुनिया की आम जनता को ईंधन की ऊंची कीमतें चुकाने पर मजबूर किया जाता रहेगा?





