बसपा बड़े जनांदोलनों वाली पार्टी कभी नहीं रही, फिर मायावती भला रविदास आंदोलन से क्यों जुड़ें?
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बसपा बड़े जनांदोलनों वाली पार्टी कभी नहीं रही, फिर मायावती भला रविदास आंदोलन से क्यों जुड़ें?

By ThePrint(Hindi) calender  29-Aug-2019

बसपा बड़े जनांदोलनों वाली पार्टी कभी नहीं रही, फिर मायावती भला रविदास आंदोलन से क्यों जुड़ें?

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में दलितों पर अत्याचार का विरोध कर सुर्खियों में आने के बाद से ही मीडिया में चंद्रशेखर आज़ाद रावण को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और मायावती के लिए राजनीतिक खतरा बताने का फैशन चल पड़ा है. गुजरात में जिग्नेश मेवाणी के पहली बार शोहरत पाने पर भी ऐसा ही हुआ था.
दिल्ली में गुरु रविदास मंदिर गिराए जाने के विरोध में दलितों के विरोध मार्च में चंद्रशेखर आज़ाद रावण के शामिल होने के बाद एक बार फिर मीडिया उन्हें मायावती के समानांतर खड़ा करने की मशक्कत कर रहा है.
इन पत्रकारों और टिप्पणीकारों से मैं कुछ सवाल पूछना चाहूंगा: क्या दलितों की मुक्ति के लिए दो या उससे भी अधिक नेता नहीं हो सकते? दलित समुदाय कोई जंगल के जानवर नहीं हैं कि जिनका राजा ‘शेर’ सिर्फ एक ही हो सकता है? किसी एक नेता के उदय के लिए दूसरे नेताओं का पतन क्यों होना चाहिए? कांग्रेस, भाजपा या किसी अन्य पार्टी में एक से अधिक ब्राह्मण नेताओं के उदय पर मीडिया ने कितनी बार सवाल उठाया है? और क्या ऐसे किसी नेता का उदय अन्य ब्राह्मण नेताओं के लिए खतरा बन जाता है?
मायावती ने विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं किया
कांशी राम और मायावती भलीभांति एक-दूसरे के पूरक साबित होते थे और एक ही वक्त दोनों दलित समुदाय के नेता थे. कांशी राम में नए लोगों को पार्टी से जोड़ने का करिश्मा था, जबकि मायावती अपने भाषणों से जनसाधारण को प्रभावित करती थीं. दोनों की जोड़ी प्रभावशाली थी.
कुछ लोगों का कहना है कि दलित मायावती पर गुस्साए हुए हैं क्योंकि वह विरोध प्रदर्शन के लिए सामने नहीं आईं. कुछ दलित चंद्रशेखर आज़ाद को भी दोषी ठहरा रहे हैं, शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बाद दिल्ली में हुई हिंसा के सिलसिले में 50 अन्य लोगों को हिरासत में लिए जाने को लेकर. पर मीडिया में कोई भी इस घटना को उजागर नहीं कर रहा, इसकी बजाय आज़ाद-मायावती संघर्ष के आधे-अधूरे विश्लेषण प्रस्तुत किए जा रहे हैं.
ये समझने के लिए कि रविदास मंदिर गिराए जाने पर बसपा या मायावती ने विरोध प्रदर्शनों में भाग क्यों नहीं लिया, हमें कुछ दशक पीछे मुड़ कर देखना होगा. बसपा कभी भी बड़े जनांदोलनों वाली पार्टी नहीं रही है. इसके विपरीत, इसने ‘राजनीतिक साधनों’ से सामाजिक परिवर्तन पर ध्यान दिया है, जैसा कि भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में महाराष्ट्र के महारों ने किया था.
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कई लेखकों ने मायावती के प्रेस बयान का उल्लेख किया है जिसमें कि उन्होंने दिल्ली में विरोध प्रदर्शन में शामिल हो रहे लोगों से शांति बनाए रखने और कानून का उल्लंघन नहीं करने की अपील की थी. बसपा ने प्रदर्शन के बाद हुई हिंसा से भी खुद को असंबद्ध बताया.
मीडिया अब उस प्रेस बयान तथा ‘सभी ज़रूरी साधनों के इस्तेमाल’ के भीम आर्मी की मान्यता का उल्लेख करते हुए ये निष्कर्ष निकाल रहा है कि चंद्रशेखर आज़ाद के उभार से मायावती को असुरक्षा महसूस हो रही है. पर बसपा की अपील में कुछ में भी नया नहीं था. कानून की हदों में रहने का आग्रह करती बसपा की प्रेस विज्ञप्तियां और पार्टी नेताओं के बयान पहले भी आ चुके हैं.
बसपा ने हमेशा ही राजनीतिक अधिकारों के लिए दलितों को जागरूक बनाने और चुनावों के ज़रिए उनके भविष्य को बदलने (और ज़रूरत पड़ने पर गोली खाने के लिए तैयार करने) का अभियान चलाया है. ब्रिटिश राज के समय उत्तर प्रदेश में कोई बड़ा जाति-विरोधी आंदोलन नहीं हुआ था, इसलिए वहां बसपा का उभार किसी चमत्कार से कम नहीं था. यह आज़ादी के 35 साल बाद राजनीति और लोकतांत्रिक परिवर्तन के रूप में सामने आया था.
बसपा कभी भी प्रतिक्रियावादी पार्टी नहीं रही
दलित समुदाय नरेंद्र मोदी सरकार की दलित-विरोधी नीतियों को लेकर गुस्से में है और एक आक्रामक नेतृत्व की आशा कर रहा है. मैल्कम एक्स के ‘सभी ज़रूरी साधनों’ के इस्तेमाल के सिद्धांत के अनुरूप खुद की रक्षा करने में कुछ भी गलत नहीं है. यहां तक कि आंबेडकर ने भी पानी के लिए महारों के संघर्ष के दौरान यही विचार किया था, जब ऊंची जाति वालों ने दलितों को पीटने की धमकी दी थी. उन्होंने कहा था: ‘यदि मौका आता है, तो हम हमें धमकी देने वालों की खोपड़ियां तोड़ने से भी नहीं हिचकेंगे, परिणाम चाहे जो हो.’ (महार, आनंद तेलतुंबड़े, पेज 135.)
बसपा का जन्म दलित पैंथर्स की तरह किसी क्रांतिकारी संघर्ष से नहीं हुआ है. बसपा के शुरुआती सदस्यों में से अधिकांश बामसेफ (पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक समुदाय कर्मचारी महासंघ) से संबद्ध सरकारी कर्मचारी थे, इसलिए उनका सक्रिय जनांदोलनों की बजाय विद्रोह के लोकतांत्रिक तरीकों को चुनना स्वाभाविक था.
कांशी राम ने भी कहा था कि हमें मतपत्रों के सहारे शासन करना चाहिए, पर हमें गोली खाने के लिए भी तैयार रहना चाहिए. हालांकि, आंबेडकर और कांशी राम दोनों आमतौर पर राजनीतिक ताकत को ही बदलावों की कुंजी मानते थे.
बसपा कभी भी ‘प्रतिक्रियावादी’ पार्टी नहीं रही, और यह नामांतर आंदोलन जैसे कई प्रमुख दलित संघर्षों से अलग रही थी. उल्लेखनीय है कि मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम बदल कर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर विश्वविद्यालय करने के लिए यह आंदोलन 16 वर्षों तक चला था. अमेरिकी विद्वान गेल ओम्वेट के अनुसार एक सामाजिक संघर्ष समूह से निकले होने के बावजूद बसपा एक राजनीतिक संगठन है, जिसका लक्ष्य सत्ता पर कब्ज़ा करने, और दलित समुदाय की बेहतरी के लिए उसका इस्तेमाल करने का है.
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आरंभिक दिनों में कांशी राम ने महंगाई के खिलाफ और न्यूनतम मजदूरी समर्थक विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया था और वह नामांतर आंदोलन के भी गवाह रहे थे. पर बहुत शुरुआत में ही वे समझ गए थे कि विरोध प्रदर्शनों से बदलाव नहीं आता. इस तरह, दिल्ली में विरोध प्रदर्शन से अनुपस्थित रहने के लिए मायावती की आलोचना करने और चंद्रशेखर आज़ाद की मौजूदगी पर जय-जयकार करने वालों को इतिहास की पूरी समझ नहीं है.
कोई द्वंद्व नहीं
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती की उपलब्धियां महाराष्ट्र में सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन करने वाली रिपब्लिकन पार्टी (आरपीआई) के मुकाबले कहीं ज़्यादा हैं. उनके कार्यकाल में हज़ारों की संख्या में दलित अधिकारी नियुक्त किए गए, और उससे भी अहम, मायावती की सरकार ने राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति सुनिश्चित कर दलितों को बहुत राहत दी थी.
वाराणसी में विशाल गुरु रविदास घाट का निर्माण और 25 एकड़ में फैले संत रविदास स्मारक पार्क का विकास बसपा सरकार के तहत ही हुआ. दलित-बहुजन नेताओं के सम्मान के लिए लखनऊ में आंबेडकर स्मारक पार्क का निर्माण भी बसपा सरकार ने ही कराया था. ये परियोजनाएं तथा दलितों के लिए बहुत सारे अन्य कार्य राजनीतिक सत्ता के सहारे ही हो सके. कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश में बसपा शासन के दौरान आंबेडकर की 15,000 से अधिक प्रतिमाएं स्थापित की गई थीं. आंबेडकर ग्राम योजना से हज़ारों दलित बहुल गांवों को फायदा पहुंचा. ये सब राजनीतिक शक्ति से संभव हुआ, विरोध प्रदर्शनों से नहीं.
बसपा और मायावती की उस बात के लिए आलोचना करना जिसमें कि उनका कभी विश्वास ही नहीं रहा, अतार्किक है. मीडिया सिर्फ मनोरंजन के लिए दो दलित नेताओं के बीच काल्पनिक संघर्ष को दिखाना चाहता है. दलित समुदाय के लिए दोनों ही नेता महत्वपूर्ण हैं, पर मीडिया अपनी चाल चल रहा है.
आप मायावती को पसंद करें, उनसे घृणा करें, उनकी आलोचना करें, निंदा करें, या उनका तिरस्कार करें, पर आप उन्हें कभी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. मायावती को खारिज करना एक भूल होगी, जो कि कई टिप्पणीकार कर रहे हैं. ये सही है कि समुदाय से जुड़े रहने के लिए मायावती को नई योजनाएं बनाने, नए तरीके ढूंढने की ज़रूरत है. कांशी राम साइकिल पर देश घूमे थे, पर समय बदल चुका है. मायावती को टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया का अधिकाधिक लाभ उठाना चाहिए. पर ब्राह्मणवादी मीडिया के रचे खेल में, नुकसान दलित समुदाय का ही होगा.
मायावती का रणनीतिक दिमाग तथा चंद्रशेखर आज़ाद रावण का बाहुबल और दलित युवाओं में उनकी अपील, साथ मिल कर जादू कर सकते हैं. ये तभी संभव होगा जब उनके निकट सहयोगी परस्पर संघर्ष के मीडिया के नकली कथानक की अनदेखी करते हुए, उन्हें साथ लाने का प्रयास करेंगे.

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