हुड्डा गलत टाइम पर कैप्टन की कॉपी कर रहे हैं - नाकाम ही होंगे
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हुड्डा गलत टाइम पर कैप्टन की कॉपी कर रहे हैं - नाकाम ही होंगे

By Ichowk calender  18-Aug-2019

हुड्डा गलत टाइम पर कैप्टन की कॉपी कर रहे हैं - नाकाम ही होंगे

हरियाणा कांग्रेस के नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा बगावत पर उतर आये हैं. हुड्डा कांग्रेस नेतृत्व को अभी वैसे ही ताकत का एहसास करा रहे हैं जैसे कभी कैप्टन अमरिंदर सिंह धमकाया और आखिरकार अपने मिशन में कामयाब रहे. दोनों नेताओं और उनके तौर तरीके में कई बातें कॉमन हैं - लेकिन राजनीतिक फैसले के हिसाब से हालात अलग अलग नजर आते हैं. पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले कैप्टन अमरिंदर भी राहुल गांधी से नाराज हुआ करते थे, भूपिंदर सिंह हुड्डा के साथ भी वही हालत है. जो काम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस नेतृत्व पर दबाव डाल कर हासिल किया था - भूपिंदर सिंह हुड्डा भी वही रास्ता अख्तियार कर रहे हैं.
हुड्डा और और कैप्टन के बागी रूख अपनाने में फर्क भी कई सारे हैं. हुड्डा की नाराजगी 23 मई तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे राहुल गांधी से है, लेकिन वो बगावत के रास्ते पर आगे तब बढ़ रहे हैं जब सोनिया गांधी फिर से कांग्रेस की कमान संभाल चुकी हैं - साथ ही, हरियाणा के मौजूदा हालात भी पंजाब में चुनाव के हालात से मेल खाना तो दूर बिलकुल अलग अलग हैं.
कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ हुड्डा की बगावत
कांग्रेस में नेतृत्व बदल चुका है. बतौर अंतरिम कांग्रेस अध्यक्ष ही सही, सोनिया गांधी ने फिर से मोर्चा संभाल लिया है. ऐसे में संगठन में कई फेरबदल के भी संकेत मिले हैं - भूपिंदर सिंह हुड्डा ने इसी दौरान बगावत शुरू कर दी है. वैसे तो हरियाणा में हुड्डा कोई नया काम नहीं करने जा रहे, बल्कि पुराने नेताओं की तरह अपने बूते खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं. हुड्डा का तरीका पंजाब के कैप्टन अमरिंदर से मिलता जुलता जरूर है, लेकिन हरियाणा के तीन पूर्व मुख्यमंत्री ऐसा कर चुके हैं और अपने दौर में राजनीतिक ताकत का एहसास भी करा चुके हैं - भजन लाल, चौधरी देवी लाल और बंसी लाल.
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ये भी एक संयोग ही है कि हुड्डा की 'परिवर्तन रैली' रोहतक में हो रही है - 20 साल पहले रोहतक से ही सोनिया गांधी ने स्टार चुनाव प्रचारक के तौर पर राजनीति की शुरुआत की थी - और अब हुड्डा भी उसी धरती से सोनिया गांधी के खिलाफ बगावती तेवर का इजहार कर रहे हैं. ये सोनिया गांधी ही हैं जिन्होंने भूपिंदर सिंह हुड्डा को 2005 से 2014 तक हरियाणा का मुख्यमंत्री बनाये रखा - और वो भी दूसरे नेताओं पर तरजीह देते हुए. 2014 की हार सोनिया की ही तरह हुड्डा के लिए भी बहुत भारी पड़ी. जब राहुल गांधी एक्टिव हुए तो अपने पसंदीदा अशोक तंवर को हरियाणा कांग्रेस की कमान सौंप दिये. हुड्डा ये पद अपने बेटे दीपेंद्र हुड्डा के लिए चाहते थे. सिर्फ यही नहीं राहुल गांधी ने रणदीप सुरजेवाला की पीठ पर हाथ रख दिया - नतीजा ये हुआ कि हुड्डा परिवार को मुख्यधारा की राजनीति में बने रहने के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ा.
हरियाणा की ये कहानी भी बिलकुल वैसी है ही जैसे पंजाब विधानसभा चुनाव में लगातार दो बार की हार के बाद राहुल गांधी ने राज्य कांग्रेस की कमान कैप्टन अमरिंदर के कट्टर विरोधी नेता को सौंप दिया. प्रताप सिंह बाजवा और कैप्टन अमरिंदर की लड़ाई तो अब भी चल रही है - और कई मुद्दों पर दोनों फिलहाल एक दूसरे के आमने सामने हो गये हैं, लेकिन कैप्टन ने वक्त रहते ही अपनी बात मनवा ली. जैसे ही कांग्रेस नेतृत्व को भनक लगी कि कैप्टन अमरिंदर पंजाब में कांग्रेस को तोड़ कर अपनी अलग पार्टी बना सकते हैं, बाजवा को हटाकर कर कमान कैप्टन को दे दी गयी.
लगता है हुड्डा भी कांग्रेस नेतृत्व पर फिलहाल वैसा ही दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
हुड्डा की परिवर्तन रैली से पहले से ही वैसी ही चर्चाएं चल पड़ीं जैसे कैप्टन के संभावित राजनीतिक कदम को लेकर किस्से शुरू हो गये थे. हुड्डा के मामले में तो पार्टी का नाम भी बताया जाने लगा - स्वाभिमान कांग्रेस या स्वराज कांग्रेस. हरियाणा में कांग्रेस के प्रभारी महासचिव गुलाम नबी आजाद ने भरसक समझाने की कोशिश की है - लेकिन उसका कोई असर हुआ हो ऐसा नहीं लगता. अगर नयी पार्टी नहीं तो हुड्डा के शरद पवार की पार्टी कांग्रेस में जाने की भी चर्चा है. हरियाणा से आने वाले बीजेपी नेता चौधरी बिरेंद्र सिंह ने तो भगवा धारण करने का भी न्योता दे दिया है.
हुड्डा का आइडिया नहीं, वक्त का चयन गलत है
सवाल ये है कि अगर भूपिंदर सिंह हुड्डा भी हरियाणा के वैसे ही कद्दावर नेता हैं जैसे पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह तो उनके असफलता की संभावना क्यों है? ऐसा होने की वजह दोनों मामलों में अलग अलग राजनीतिक हालात का होना है - और हुड्डा फिलहाल वे फायदे उठाने की स्थिति में नहीं हैं जिन हालात में कैप्टन चुनाव भी जीते और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज भी हो गये. ये कहना ज्यादा सही होगा कि हुड्डा का आइडिया नहीं वक्त का चयन गलत है. पंजाब की बात और थी, हरियाणा में हालात बीजेपी के पक्ष में हैं और कांग्रेस बार बार शिकस्त झेल रही है.

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