आर्टिकल 370 पर बीजेपी ने सहयोगियों को भरोसे में नहीं लिया - के सी त्यागी
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आर्टिकल 370 पर बीजेपी ने सहयोगियों को भरोसे में नहीं लिया - के सी त्यागी

By Bbc calender  10-Aug-2019

आर्टिकल 370 पर बीजेपी ने सहयोगियों को भरोसे में नहीं लिया - के सी त्यागी

केंद्र की बीजेपी सरकार ने कश्मीर को विशेष दर्ज देने वाला अनुच्छेद 370 हटा दिया है, लेकिन एनडीए गठबंधन में बीजेपी की सहयोगी जनता दल यूनाइटेड इस मामले पर बीजेपी से सहमत नहीं है. एनडीए का हिस्सा होते हुए और एनडीए का संस्थापक सदस्य होते हुए, हमने दोनों सदनों में वॉकआउट करके अपनी नाराज़दी और असहमति का इज़हार किया. हालांकि राज्य सभा में जेडीयू के सासंद रामचंद्र प्रसाद सिंह के बयान से लोगों को लगा कि पार्टी का स्टैंड बदल गया है. लेकिन ऐसा नहीं है. विरासत में मिली समाजवादी आंदोलन की बागडोर इस वक्त नीतीश कुमार के हाथ में है. इसके तीन बड़े नेता जय प्रकाश, राम मनोहर लोहिया और जॉर्ज फर्नांडिस इस बात के हिमायती रहे हैं कि कश्मीर रियासत में आर्टिक 370 रहना चाहिए.
जब जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्लाह साहब को गिरफ्तार किया गया और उनकी सरकार बर्ख़ास्त की गई, तब सबसे ज़्यादा विरोध समाजवादियों ने ही किया था. उस वक्त पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे. डॉक्टर लोहिया ने जेल में शेख अबदुल्लाह साहब से मुलाकात करने के लिए अपने दो एमपी राम सेवक यादव और कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया को भेजा था. ये लोग डॉक्टर लोहिया की चिट्ठी लेकर गए थे, कि नेहरू सरकार के द्वारा किया गया जो कार्य है, जो नज़रबंदी और सरकार की बर्ख़ास्तगी है, उसका हम विरोध करते हैं.
उसके बाद जयप्रकाश नारायण ने हिंदुस्तान टाइम्स में जवाहर लाल नेहरू को चिट्ठी लिखी. बाद में इंदिरा जी को चिट्ठी लिखी और दर्जनों बार देश-विदेश के कई सेमिनारों में जम्मू-कश्मीर में हो रहे लोकतंत्र के हनन का ज़िक्र किया. उन्होंने जवाहर लाल नेहरू द्वारा शेख अब्दुल्लाह की गिरफ़्तारी और बर्ख़ास्तगी का विरोध किया, जिसके लिए उन्हें भी कई बार लोगों का विरोध झेलना पड़ा. उसके बाद समाजवादी आंदोलन के अंतिम नेता जॉर्ज फर्नांडिस बाद में एनडीए के संयोजक भी बने.
1988 में अटल बिहारी वाजपयी की सरकार ने जब सिर्फ़ 14 दिन पूरे किए, तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का गठन हुआ. जिसके संयोजक जॉर्ज फर्नांडिस बने थे और अटल बिहारी वाजपयी अध्यक्ष बने. लगभग 24 पार्टियां शामिल हुई थीं. इसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस, ममता बनर्जी की टीएमसी, जनता दल यूनाइटेड, समता पार्टी और टीडीपी भी शामिल थी. उस वक्त हमने तीन विवादित मुद्दे नेशनल एजेंडा ऑफ़ गवर्नेंस से बाहर कर दिए थे. कहा गया था कि यूनिफॉर्म सिविल कोड इसका हिस्सा नहीं होगा, आर्टिकल 370 पर यथावत यानी पुराना रूप बना रहेगा और अयोध्या विवाद पर अदालत का फ़ैसला सभी को मान्य होगा.
अटल जी की सरकार जबतक रही, कभी भी इन मुद्दों पर बहस नहीं हुई.
कश्मीर के मुद्दे पर अटल बिहारी वाजपयी लाल चौक पर कश्मीरियों से कहकर आए थे कि इस समस्या का समाधान हम कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत के आधार पर करेंगे. और कभी भी वहां इस तरह का विवाद नहीं हुआ. अब परिस्थितियां बदली हैं, लेकिन हम अपने पुराने स्टैंड पर बने हुए हैं. हमने ट्रिपल तलाक़ पर भी बोला कि ये जल्दबाज़ी में उठाया गया क़दम है. इसपर सभी पक्षों से बात करनी चाहिए थी, एनडीए के अंदर भी एक आम सहमति बनाने का प्रयास करना चाहिए था. जो सरकार की ओर से नहीं किया गया और हम वॉकआउट कर गए.
आर्टिकल 370 पर भरोसे में नहीं लिया
इसी तरह आर्टिकल 370 की समाप्ति के समय एनडीए के किसी भी घटक दल को भरोसे में नहीं लिया गया. जेडीयू, अकाली दल, असम गण परिषद और यहां तक कि शिवसेना को भी भरोसे में नहीं लिया गया.अटल बिहारी वाजपयी और नरेंद्र मोदी के दौर में फर्क है. उस वक्त बहुमत की सरकार नहीं थी. 1977 में जब जनता पार्टी बनी, उसमें भी अटल बिहारी और लाल कृष्ण आडवानी शामिल थे. जनता पार्टी के मेनिफेस्टो में भी उल्लेख था कि आर्टिकल 370 से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी.
कश्मीर के मौजूदा हालात पर जेडीयू चुप क्यों?
समाजवादी इससे भी बुरा दौर देख चुके हैं. जब आपातकाल लगा तो मंत्रिमंडल के किसी सदस्य को पता भी नहीं था कि देश में इमरजेंसी लगने जा रही है. उस वक्त जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई और अटल बिहारी समेत डेढ़ लाख से ज़्यादा लोगों को बिना वजह रातों रात गिरफ़्तार किया गया.
हिंदुस्तान का आवाम इस तरह के सदमे पहले भी बर्दाश्त कर चुका है.
अब जयप्रकाश और लोहिया जैसे लोग नहीं बचे. समाजवादी आंदोलन भी परिवारों, जातियों के झुंडों तक सीमित रह गया. और हम लोगों की आवाज़ भी कमज़ोर है. उतनी बुलंद नहीं है. उतनी संगठित नहीं है. और तबके-अबके माहौल में भी फर्क इसलिए आया है कि जम्मू-कश्मीर में मुख्यधारा की दो पार्टियां, वो भी रियासत में कुछ अच्छा करने में नाकाम रही हैं. पिछले हफ्ते जब मैं कश्मीर गया तो लगा कि जैसे 70 साल में वहां कोई विकास नहीं हुआ है. इसलिए आर्टिकल 370 का जिस तरह का सदउपयोग किया जाना चाहिए था वो नहीं हुआ.
हुर्रियत के नेताओं की ज़िद भी ऐसी रही कि एक बार गृह मंत्री के साथ मैं, रामविलास पासवान, सीताराम येचुरी और डी राजा हुर्रियत नेता गिलानी के घर के बाहर बातचीत के लिए आधा घंटा बैठे रहे, लेकिन उन्होंने बात नहीं की. लेकिन भारत सरकार के ताज़ा कदम पर भारत के बुद्धिजीवियों और सिविल सोसाइटी के लोगों का जैसा प्रतिरोध होना चाहिए था, वो नहीं हो पाया.
कश्मीर में पीडीपी और बीजेपी का जो गठबंधन था, वो अपवित्र था. ना बीजेपी ने अच्छा काम किया और ना पीडीपी ने. एक के मेनिफेस्टो में था कि आर्टिकल 370 हटाएंगे और पीडीपी के घोषणापत्र में था कि सेल्फ रूल कायम करेंगे जिसमें भारत की करंसी तक नहीं चलेगी. इसलिए ये बेमेल शादी थी. मुझे अफ़सोस है कि उसकी मियाद इतनी लंबी कैसे हो गई.
जेडीयू ने वॉकआउट कर बीजेपी का समर्थन किया?
हमें नहीं लगता कि इस वक्त एनडीए का कोई विकल्प है. अगर हम एनडीए में रहते हुए ख़िलाफ़ में वोट डालते हैं तो वो अनैतिक होता. अगर हम एनडीए के बाहर होते और तब एनडीए के किसी बिल के ख़िलाफ़ वोट डालते. अपनी असहमति की अभिव्यक्ति का हमने दूसरा रास्ता चुना और हम नहीं मानते कि हम किसी भी तरह से इन दोनों बिलों को पास कराने में सहायक हुए.
क्या बिहार की एनडीए सरकार में सबकुछ ठीक नहीं है?
बिहार सरकार का एजेंडा विकास, गुड गवर्नेंस और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार है. हम भ्रष्टाचार, अपराध पर समझौता नहीं करते हैं. पिछले साल के राम नवमी के जुलूस में एक केंद्रीय मंत्री (अश्विनी चौबे) के बेटे को भी उन्हीं धाराओं में बंद किया, जिनमें दूसरे उपद्रवी बंद हुए थे, इसलिए इन सवालों पर हम वहां भी समझौता नहीं करते.
लेकिन वो सरेंडर करने का मौका था?
हमारी अकेली सरकार है, जहां कोई सांप्रदायिक स्थिति नहीं है और ना तनाव है. लेकिन हमने कांग्रेस पार्टी की सेकुलर सरकार भी देखी है, जब भागलपुर में करीब 22 सौ मुस्लिमों की हत्या हो गई थी. देश के प्रधानमंत्री भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे और बिहार में भी थे. कम से कम हमारे यहां सांप्रदायिक मामले नहीं होते.
दुर्भाग्य है कि 1947 के बाद, गांधी जी की शहादत के बाद जो सपने संयुक्त भारत में देखे गए थे, कि किसी तरह का भेदभाव नहीं होगा, सबको संविधान के दायरे में अपने-अपने धर्मों और विश्वासों को मानने की आज़ादी होगी, मुझे अफसोस है कि उन विश्वासों में कमी आई है.
ये नहीं भूलना चाहिए कि बिहार में हमारी मिली जुली सरकार है और जो तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियां हैं, वो परिवारों और उनके द्वारा अर्जित धनों की सुरक्षा के लिए और जातियों के गिरोहों के रूप में बदल गई हैं. इसलिए हमारे सामने वर्तमान में विकल्प भी बहुत कम बचे हैं. इसलिए हमें विश्वास है कि 2020 में भी राज्य में एनडीए की ही सरकार बनेगी और नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बनेंगे.

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