दिल्‍ली की CM बनने पर सुषमा ने ऐसे ऊंचा किया हरियाणा का सिर, जानें पूरा वाक्‍या
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दिल्‍ली की CM बनने पर सुषमा ने ऐसे ऊंचा किया हरियाणा का सिर, जानें पूरा वाक्‍या

By Jagran calender  07-Aug-2019

दिल्‍ली की CM बनने पर सुषमा ने ऐसे ऊंचा किया हरियाणा का सिर, जानें पूरा वाक्‍या

पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने बेशक हरियाणा से निकलकर दिल्‍ली व राष्‍ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहीं, लेकिन अपनी जड़ों से सदैव जुड़ी रहीं। वह भाजपा में अपने गृह राज्य की बड़ी पैरोकार थीं। उन्‍होंने हरियाणा में दूसरे दलों से गठबंधन के सहारे भाजपा की जड़ें जमाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई। हरियाणा से उनका ऐसा लगाव था कि वह दिल्‍ली की मुख्‍यमंत्री बनीं तो शपथ लेने के बाद बोलीं कि वह हरियाणा की बेटी हैं। इस पर पार्टी के रणनीतिकारों ने इस बयान पर सवाल भी उठाए, लेकिन सुषमा का तर्क था कर्मभूमि के बावजूद कर्मभूमि को नहीं भूल सकते। उनके इस बयान से हरियाणा के लोगों को आज भी नाज है।
दिल्‍ली की मुख्‍यमंत्री बनने के बाद खुद को बताया था हरियाणा की बेटी
सुषमा स्‍वराज के चिरनिद्रा में जाने के बाद हरियाणा की राजनीति में भी बड़ा खालीपन आ गया है। वह राष्‍ट्रीय  गृह राज्य हरियाणा के नेताओं की सुषमा स्वराज खुलकर मदद भी करती थीं। सुषमा जब दिल्ली की सीएम बनीं तो उन्होंने शपथ लेते ही यह कहने में गुरेज नहीं किया कि वह हरियाणा की बेटी हैं। दिल्‍ली में कुछ समय बाद विधानसभा चुनाव होने थे, ऐसे में भाजपा के रणनीतिकारों ने इस तरह के बयान को गलत ठहराया था। खुद सुषमा स्वराज ने इसका जबाव भी खुलेरूप में यह कहकर किया कि जरूरी नहीं है कि जन्म और कर्मभूमि एक हो
सुषमा स्‍वराज ने हरियाणा में भाजपा की जड़ें गहरी करने में भी बेहद अहम भूमिका निभाई। उन्‍होंने अन्‍य दलों से समझौते की राह निकाली। वह महज 25 साल की उम्र में 1977 में चौधरी देवीलाल के नेतृत्‍व में बनी सरकार में मंत्री बन गई थीं। इसके बाद 1987 में एक बार फिर चौधरी देवीलाल की लोकदल से भाजपा का समझौता कराने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। भाजपा के केंद्रीय नेताओं की तरफ से समझौते की बाबत चौधरी देवीलाल से चर्चा के लिए तत्कालीन पार्टी महामंत्री गोविंदाचार्य को अधिकृत किया गया था लेकिन इसकी पूरी पटकथा सुषमा स्वराज ने ही लिखी थी।
इसी तरह 1996 में जब हरियाणा विकास पार्टी के नेता चौधरी बंसीलाल से समझौते की बात आई तो सुषमा स्वराज ने ही आगे आकर इसको अंतिम रूप दिया। उस समय पार्टी के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवानी सहित राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के खास रहे बंसीलाल से राजनीतिक समझौते के खिलाफ थे। सुषमा स्वराज नहीं चाहतीं थी कि 1996 में राज्य में भाजपा का चुनावी समझौता ओमप्रकाश चौटाला के नेतृत्व वाले राजनीतिक दल से हो। 1996 में जब बंसीलाल की हविपा और भाजपा गठबंधन की सरकार बन गई तो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी सहित अन्य शीर्ष नेताओं ने भी सुषमा के निर्णय की सराहना की।
समय के अनुरूप राजनीतिक फैसले लेने में सुषमा स्‍वराज का कोई जोड़ नहीं था। हरियाणा में जब 1999 में बंसीलाल की सरकार गिरी तो उन्होंने ओमप्रकाश चौटाला से भाजपा का समझौता कराने में भी गुरेज नहीं की। 2000 के विधानसभा चुनाव में चौटाला के साथ मिलकर भाजपा ने चुनाव लड़ा। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा ने कुलदीप बिश्‍नोई के नेतृत्व वाली हरियाणा जनहित कांग्रेस पार्टी के साथ समझौता किया। इसके लिए भी सुषमा स्वराज ने ही कुलदीप के पिता पूर्व सीएम चौधरी भजन लाल के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की अनदेखी कर पार्टी नेताओं को मनाया था।
बाद में जब लोकसभा चुनाव में पार्टी की जीत हुई ताे राज्य विधानसभा चुनाव में समझौता तोड़ने के लिए भी सुषमा के ही समर्थक नेता सामने आए। मौजूदा स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने सबसे पहले कुलदीप बिश्‍नोई से समझौता तोड़ने का प्रस्ताव रखा। सिर्फ राजनीतिक दलों समझौते करने या तोड़ने ही नहीं, हरियाणा के तमाम राजनीतिक फैसलों में सुषमा का दखल रहता था। 1996 में जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में कांग्रेस के तत्कालीन सांसदों को भाजपा में शामिल करने का प्रस्ताव आया तो सुषमा ने ही कर्नल रामसिंह को पार्टी में शामिल किया।

कृष्णपाल गुर्जर सहित अनेक नेताओं की राजनीतिक गुरु थीं सुषमा
हरियाणा में कई ऐसे नेता हैं जिन्हें सुषमा स्वराज ने राजनीति के क,ख,ग सिखाए। मौजूदा विधानसभा में विधायक असीम गोयल सहित अनेक विधायक हैं जो सुषमा की पैरवी के कारण ही टिकट लेने में सफल रहे। केंद्रीय राज्यमंत्री कृष्णपाल गुर्जर को फरीदाबाद के मेवला महाराजपुर से1996 में पार्टी का टिकट देने से लेकर बंसीलाल सरकार में कैबिनेट स्तर का मंत्री बनवाने में सुषमा का ही हाथ रहा। इसलिए सुषमा को वह अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।
 

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