क्या केंद्र, राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट को महत्व नहीं देती हैं?
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क्या केंद्र, राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट को महत्व नहीं देती हैं?

By Satyahindi calender  28-Jul-2019

क्या केंद्र, राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट को महत्व नहीं देती हैं?

क्या केंद्र की मोदी सरकार और तमाम राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट को कोई महत्व नहीं देती है? क्या उनके लिए सुप्रीम कोर्ट और उसके आदेशों का कोई अर्थ नहीं रह गया है? क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश अब सिर्फ़ काग़ज़ों तक सिमट कर जाएँगे? ये सवाल इसलिए उठते हैं कि बीते दिनों सर्वोच्च अदालत ने एक आदेश जारी कर पूछा है कि उसने मॉब लिन्चिंग रोकने के लिए जो आदेश जारी किए थे, उसे कितना लागू किया गया है। 
क्या था सुप्रीम कोर्ट का आदेश?
देश भर से आ रही मॉब लिन्चिंग घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने 17 जुलाई 2018 को एक आदेश जारी कर केंद्र सरकार से कहा था कि वह इसे रोकने के लिए संसद से एक बिल पारित करवाए। इस आदेश में मॉब लिन्चिंग से जुड़े हर पहलू पर सुझाव दिए गए थे। 
  • अदालत ने राज्य सरकारों से कहा था कि वे उन ज़िलों, सब-डिवीजन और गाँवों की शिनाख़्त करें, जहाँ इस तरह की वारदात हुई हों। 
  • हर पुलिस अफ़सर की यह ज़िम्मेदारी होगी कि यदि उसे ऐसा लगे कि कोई भीड़ या किसी तरह के कार्यकर्ताओं का समूह किसी को निशाना बनाने जा रहा है तो उसे रोके और वहाँ से चले जाने को कहे और यह सुनिश्चित करे कि वे वहाँ से चले जाएँ। 
  • केंद्र और राज्य सरकारें प्रचार माध्यमों और सरकारी वेबसाइटों के ज़रिए यह सबको बताए कि मॉब लिन्चिंग से जुड़े लोगों के ख़िलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। 
  • अदालत ने राज्य सरकारों से कहा कि वे सोशल मीडिया पर किसी तरह के भड़काऊ, उत्तेजित या हिंसक मैसेज, वीडियो या इस तरह की दूसरी सामग्री को प्रचारित करने से रोकें। वे ऐसा करने वालों के ख़िलाफ़ मौजूदा क़ानूनों के तहत कार्रवाई करें। 
  • सरकार यह सुनिश्चित करे पीड़ितों या उनके परिजनों को बाद में भी परेशान किया जाए। 
  • राज्य सरकारें मॉब लिन्चिंग पीड़ित कोष का गठन करें और पीड़ितों को आर्थिक मदद और मुआवजा दें। 
  • मॉब लिन्चिंग के मामलों की सुनवाई करने के लिए अलग से अदालतों का गठन हो, वहाँ सुनवाई की प्रक्रिया तेज़ हों और यह कोशिश की जानी चाहिए कि 6 महीने के अंदर मामले पर फ़ैसला सुना दिया जाए। 
  • अदालतों को यह देखना चाहिए कि वे दोषी पाए गए लोगों के ख़िलाफ़ मौजूदा क़ानूनों के तहत कड़ी से कड़ी सज़ा दें। 
  • यदि कोई पुलिस अफ़सर मॉब लिन्चिंग मामले में अपनी ड्यूटी से कोताही बरतता हुआ पाया जाता है तो यह माना जाए कि इसने जानबूझ कर लापरवाही की है। 
सवाल यह उठता है कि सुप्रीम कोर्ट को आदेश जारी करने के एक साल बाद यह क्यों कहना पड़ा है कि उसे इन आदेशों को लागू करने के बारे में जानकारी दी जाए। इसकी वजह साफ़ है। इसकी वजह यह है कि अब तक ज़्यादातर आदेशों का पालन नहीं किया गया है। अधिकतर राज्य सरकारों ने मॉब लिन्चिंग के मामलों की सुनवाई के लिए अलग अदालतों का गठन नहीं किया है। इसी तरह राज्य सरकारों ने पीड़ितों को मुआवज़ा देने पर कोई ठोस नीति का एलान नहीं किया है न ही आर्थिक मदद देने के लिए किसी कोष का गठन किया है। 
प्रधानमंत्री को मंगलवार को ख़त लिखने वालों में पुरस्कार विजेता फ़िल्म निर्माता अपर्णा सेन व मणि रत्नम और इतिहासकार रामचंद्र गुहा जैसी हस्तियाँ शामिल थीं। पत्र में कहा गया है कि बेहद दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि ‘जय श्री राम’ का नारा युद्धोन्माद पैदा करने वाला बन गया है और इस वजह से क़ानून व्यवस्था की स्थिति ख़राब होती जा रही है और इसके नाम पर ही कई हत्या की घटनाएँ हो चुकी हैं। 
पत्र में यह भी कहा गया है कि बिना असहमति के लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता। लोगों को सिर्फ़ सरकार का विरोध करने के कारण राष्ट्रद्रोही या अर्बन नक्सल न करार दे दिया जाए या उन्हें जेल में न डाल दिया जाए। 23 जुलाई को लिखे इस पत्र में कहा गया था कि प्रधानमंत्री जी आपने तबरेज़ वाली घटना की संसद में कड़ी निंदा की थी, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। सवाल पूछा गया है कि ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वालों के ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई की गई है।
लेकिन इसके बाद फ़िल्म जगत के ही 62 लोगों ने इन 49 लोगों पर पलटवार करते हुए एक ख़त लिखा। मॉब लिन्चिंग पर प्रधानमंत्री मोदी को खुला ख़त लिखने वाले 49 हस्तियों पर फ़िल्म जगत के ही प्रसून जोशी, कंगना रनौत, विवेक अग्निहोत्री समेत 62 लोगों ने भी खुला ख़त लिखकर सीधा हमला बोला है। 
49 हस्तियों ने जहाँ लिन्चिंग और ‘जय श्रीराम’ के नाम पर हो रहे हमले को रोकने का प्रधानमंत्री मोदी से आग्रह किया था वहीं 62 फ़िल्मी हस्तियों ने उन सभी पर ‘गिने-चुने मामलों में ग़ुस्सा दिखाने’, ‘झूठे नैरेटिव तैयार करने’ और ‘राजनीतिक पूर्वाग्रह रखने’ का आरोप लगाया।
उन्होंने सरकार की आलोचना करने वाले 49 लोगों को लिखा, ‘...वास्तव में हम मानते हैं कि मोदी शासन में सरकार की आलोचना करने और अलग-अलग विचारों के रखने की सबसे ज़्यादा आज़ादी है। असहमति की भावना रखने की छूट इससे ज़्यादा कभी भी नहीं रही।’
पिछले महीने झारखंड के ही जमशेदपुर में मोटर साइकिल चोरी के शक में 24 साल के युवक तबरेज अंसारी को भीड़ ने रात भर पीटा था और बाद में उसकी मौत हो गई थी। भीड़ ने उसे ‘जय हनुमान’ का नारा लगाने के लिए भी कहा था। कुछ दिन पहले ही भीड़तंत्र के क्रूर होने की एक घटना बिहार के सारण में हुई थी। सारण जिले के बनियापुर गाँव में गाँव के लोगों ने तीन लोगों को पकड़ा था और आरोप लगाया कि ये उनके पशुओं को चोरी करने के लिए आए थे। इसके बाद ग्रामीणों ने तीनों को पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया था।  

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