इंदिरा जैसा संघर्ष तो प्रियंका ने किया लेकिन कब खड़ी होगी कांग्रेस?
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इंदिरा जैसा संघर्ष तो प्रियंका ने किया लेकिन कब खड़ी होगी कांग्रेस?

By Satyahindi calender  21-Jul-2019

इंदिरा जैसा संघर्ष तो प्रियंका ने किया लेकिन कब खड़ी होगी कांग्रेस?

प्रियंका गाँधी ने सक्रिय राजनीति में उतरने के बाद जो पहला आंदोलन किया उसमें वह सफल रहीं। वह सोनभद्र नरसंहार के पीड़ित परिवारों के सदस्यों से मिलीं भी और बिना जमानत या किसी सरकारी कार्रवाई के उन्हें छोड़ भी दिया गया। प्रियंका गाँधी ने जिस दृढ़ता से इस मुद्दे को एक आंदोलन बनाने का प्रयास किया, वह शुरुआती दौर में सफल होता दिख रहा है। 
उत्तर प्रदेश की क़ानून व्यवस्था का सच छिपाए नहीं छुप रहा। यहाँ आये दिन हत्या-बलात्कार की घटनाएँ हो रही हैं और आम आदमी के साथ-साथ पुलिस तक को निशाना बनाने से बदमाश नहीं चूक रहे हैं। इस लचर क़ानून व्यवस्था में जो सबसे ज़्यादा पीड़ित वर्ग है वह है दलित, आदिवासी, पिछड़ी जाति व मुसलिम समाज। इस समीकरण ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को वर्षों तक सत्ता में टिकाये रखा था। प्रियंका गाँधी के इस क़दम के बाद इस वर्ग के लोगों में उनको लेकर एक आस और विश्वास ज़रूर पैदा हुआ होगा और कांग्रेस को उसे अब कायम रखने या और दृढ़ करने की ज़रूरत है। 
कांग्रेस कार्यकर्ताओं को अब हर उस मॉब लिंचिंग या दलितों पर होने वाले अत्याचार के ख़िलाफ़ संघर्ष करना होगा जो इन दिनों उत्तर प्रदेश में आम हो चली है। यदि वे ऐसा करने में विफल रहे तो आने वाले दिनों में राजनीति उनके लिए हार दर हार का चक्र बनकर रह जायेगी।
प्रियंका गाँधी जब भी राजनीति के मैदान में उतरती हैं, कांग्रेस उनमें इंदिरा गाँधी की छवि देखने लगती है। इस छवि को वह आम जनता के दिलो-दिमाग में भी बिठाने का प्रयास करती है। इस आंदोलन के दौरान भी ऐसा हुआ और प्रियंका-इंदिरा की तुलना जैसे बयान भी दिए गए। लोकसभा चुनाव से पहले जब प्रियंका ने गंगा यात्रा की तो ऐसे ढेरों प्रसंग मीडिया की सुर्खियाँ बने और सोशल मीडिया पर छाये रहे। अब प्रियंका गाँधी सोनभद्र नरसंहार के पीड़ित परिवारों मिल चुकी हैं तो फिर से सोशल मीडिया और मीडिया उनमें इंदिरा गाँधी की छवि तलाश रहा है। 
प्रियंका गाँधी के सड़क पर धरना देने की इंदिरा गाँधी के धरना देने से तुलना की जा रही है और सोनभद्र की उनकी यात्रा को बेलछी (बिहार) में हुए नरसंहार के बाद इंदिरा गाँधी के वहाँ के दौरे से जोड़ा जा रहा है।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब कांग्रेस के नीति-निर्धारक इस तरह का प्रचार या टोटकेबाज़ी का सहारा लेते हुए दिख रहे हैं। सोनिया गाँधी ने जब बेल्लारी का रुख किया था तब कांग्रेस के नेताओं ने इसकी तुलना इंदिरा गाँधी के चिकमंगलूर चुनाव से करनी शुरू कर दी थी। यही नहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में राहुल गाँधी के प्रचार की शुरुआत आदिवासी बहुल सीट धुलिया-नंदुरबार से शुरू कराकर कांग्रेस ने यह शिगूफ़ा छोड़ा था कि इंदिरा जी और पंडित नेहरू भी यहीं से प्रचार अभियान शुरू करते थे। पटना के गाँधी मैदान में राहुल गाँधी की सभा को भी ऐसे ही प्रचारित किया गया था। लेकिन नतीजा क्या हुआ? 

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