कांग्रेस खैर मनाये - दिल्ली में न सरकार है, न वो विपक्ष में है!
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कांग्रेस खैर मनाये - दिल्ली में न सरकार है, न वो विपक्ष में है!

By Ichowk calender  19-Jul-2019

कांग्रेस खैर मनाये - दिल्ली में न सरकार है, न वो विपक्ष में है!

और कुछ हो न हो, कांग्रेस के पास खबरों में बने रहने के बहुत से बहाने होते हैं. कभी गोवा में दो-तिहाई विधायकों के बीजेपी ज्वाइन करने को लेकर तो कभी तेलंगाना में कांग्रेस छोड़ने को लेकर. कर्नाटक में तो कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे मंजूर होने तक खेल चल ही रहा है.
दिल्ली का भी हाल गोवा, तेलंगाना और कर्नाटक से ज्यादा अलग नहीं है, बस हालात अलग हैं. कांग्रेस जिस तरह अंदरूनी झगड़े से हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान में जूझती है, दिल्ली की हालत उनसे किसी भी मायने में अलग नहीं लगती. फर्क बस ये है कि बाकी राज्यों में झगड़ा स्थानीय नेताओं के बीच है तो दिल्ली में दो सीनियर नेताओं में वर्चस्व का संघर्ष चल रहा है.
क्या कांग्रेस के लिए वरदान साबित होगा राहुल गांधी का इस्तीफ़ा?
दिल्ली कांग्रेस के प्रभारी पीसी चाको और PCC अध्यक्ष शीला दीक्षित की लड़ाई तो जग जाहिर है, लेकिन ताजा मामला थोड़ा अलग है. पीसी चाको ने पत्र लिख कर शीला दीक्षित को तबीयत ठीक नहीं होने के चलते आराम करने की सलाह दी है.
शीला दीक्षित को चाको की सलाह
बमुश्किल एक महीना हुआ होगा. राहुल गांधी ने पीसी चाको और शीला दीक्षित के साथ मीटिंग करके दोनों का झगड़ा सुलझाने की कोशिश की थी. दोनों ही नेताओं ने मीटिंग में कांग्रेस को खोई हुई प्रतिष्ठा वापस दिलाने के लिए कस्मे-वादे निभाने का पूरा माहौल भी बनाया - लेकिन कुछ ही घंटे बाद दोनों तरफ से राजनीतिक चालें चली जाने लगीं.
दोनों नेताओं के बारे में जो सुनने को मिलता है वो ये कि शीला दीक्षित फैसले खूब लेती हैं और उनसे जुड़े सर्कुलर भी जारी करती रहती हैं, जबकि पीसी चाको ऐसे ज्यादातर फैसलों को लेकर शीला दीक्षित को पत्र लिखते रहते हैं. चाको के पत्र अक्सर शीला दीक्षित के फैसलों को पलटने वाले ही होते हैं. अब पीसी चाको का एक नया पत्र खूब चर्चित हो रहा है. ये चाको की ओर से शीला दीक्षित को नयी सीरीज का लगातार चौथा पत्र बताया जा रहा है.
शीला दीक्षित को पीसी चाको ने जो नया पत्र भेजा है उसका मजमून भी काफी दिलचस्प है, 'विधानसभा चुनाव में कुछ ही महीने हैं इसलिए पार्टी का काम जितनी जल्द हो सके सुव्यवस्थित करना है. आपकी तबियत ठीक नहीं है. अस्पताल में हैं. मैने 29 जून, 1 जुलाई और 13 जुलाई को जो पत्र लिखे उसमें किसी का भी जवाब मुझे नहीं मिला है.'
क्या पीसी चाको सेहत पर सवाल उठाकर शीला दीक्षित को अनफिट साबित करने की कोशिश कर रहे हैं?
शीला दीक्षित की सेहत और उम्र को लेकर सवाल तो तब भी उठे थे जब उन्हें दिल्ली की कमान सौंपी जा रही थी. यही वो वजह रही कि शीला दीक्षित की मदद के लिए दिल्ली में तीन तीन कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किये गये.
चाको दिल्ली कांग्रेस में चाहते क्या हैं?
शीला दीक्षित को पीसी चाको के पसंद नहीं करने की एक वजह तो समझ में आती है - दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी से गठबंधन के सवाल पर दोनों आखिर तक दो-दो हाथ करते रहे. गठबंधन तो नहीं हुआ लेकिन चुनाव नतीजों से तो यही मालूम हुआ कि शीला दीक्षित का आप के साथ गठबंधन न करने का फैसला सही था.
जिस मोदी लहर में राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार जाते हों - क्या पीसी चाको को लगता है कि दिल्ली में आप के साथ मिल कर चुनाव लड़ने से कांग्रेस को कुछ सीटें मिल सकती थीं? अगर पीसी चाको को वाकई ऐसा लगता है तो वो कांग्रेस के शुभेच्छु तो कहीं से भी नहीं माने जा सकते.
आम चुनाव में कांग्रेस ज्यादातर सीटों पर दूसरे नंबर पर रही, जबकि आप के उम्मीदवार न सिर्फ छिटक कर तीसरे स्थान पर पहुंच गये बल्कि कइयों की तो जमानत भी जब्त हो गयी. क्या कांग्रेस के लिए ये कोई मामूली बात है? फिर भी अगर पीसी चाको की अपेक्षा कुछ और है तो निश्चित तौर पर राहुल गांधी को अपनी बातों से यकीन दिला ही चुके होंगे.
पंजाब कांग्रेस में भी तो ऐसी ही लड़ाई चल रही है. अब ये तो नहीं माना जा सकता कि नवजोत सिंह सिद्धू के पंजाब सरकार में मंत्रीपद से इस्तीफा दे देने के बाद मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से उनका झगड़ा भी खत्म हो चुका होगा. कैप्टन अमरिंदर को तो लगने लगा था कि सिद्धू उन्हें हटाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी हथियाना चाहते हैं.
वैसे शीला दीक्षित और चाको विवाद में एक और फैक्टर है - संदीप दीक्षित. संदीप दीक्षित भी कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे कांग्रेस नेताओं में शुमार रहे हैं जो किसी दौर में राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाये जाने के विरोधी रहे. कहने को तो शीला दीक्षित भी कहा करती रहीं कि सोनिया गांधी को पद पर बने रहना चाहिये, लेकिन कभी ऐसा नहीं कहा कि राहुल गांधी न बनें. संदीप दीक्षित, शीला दीक्षित के लड़के हैं और दिल्ली से लोक सभा सांसद रह चुके हैं.
आम चुनाव में एक बात और भी देखने को मिली कि टिकट संदीप दीक्षित को नहीं मिला जबकि शीला दीक्षित ने लोक सभा का चुनाव लड़ा भी. संदेश तो ये समझा गया कि शीला दीक्षित दिल्ली में कांग्रेस को सत्ता दिलाने के लिए लायी गयी हैं, फिर उनके लोक सभा चुनाव लड़ने का क्या मतलब. दिल्ली के लिए शीला दीक्षित को विधानसभा चुनाव लड़ना चाहिये. ऐसा लगता है जैसे संदीप दीक्षित का टिकट काटने के लिए ही शीला दीक्षित को चुनाव मैदान में उतारा गया हो.
शीला दीक्षित को गांधी परिवार का करीबी माना जाता है. इस मामले में गांधी परिवार से मतलब सोनिया गांधी से है. फिर तो हो सकता है राहुल गांधी को शीला दीक्षित पसंद न आती हों. हालांकि, 2017 के यूपी चुनाव में कुछ दिनों के लिए शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया गया था. वो बस यात्रा पर भी निकली थीं, लेकिन तबीयत खराब हो गयी थी. हालांकि, तब सोनिया गांधी की सेहत ठीक नहीं होने की वजह से सारा दारोमदार राहुल गांधी पर ही था.
सवाल ये है कि आखिर पीसी चाको चाहते क्या हैं?
क्या पीसी चाको शीला दीक्षित के साथ काम कर रहे तीन कार्यकारी अध्यक्षों में से किसी एक को कमान सौंपने की रणनीति पर काम कर रहे हैं? या फिर वो दिल्ली कांग्रेस का अध्यक्ष बनना चाहते हैं?
अगर ऐसा नहीं है तो कांग्रेस में सुधार के नाम पर तो उनकी सारी कोशिशें कांग्रेस की लुटिया डूबोने वाली ही लगती हैं.
पीसी चाको एक तरफ तो शीला दीक्षित के खिलाफ शिद्दत से मुहिम चला रहे हैं, दूसरी तरफ ये भी शिकायत है कि वो कांग्रेस को कंट्रोल नहीं कर रही हैं. अपने पत्र में चाको ने इस बात पर भी नाराजगी जाहिर की है कि गैरजिम्मेदाराना बयान देकर प्रवक्ता मीडिया के जरिये प्रभारी के फैसलों पर सवाल खड़े कर रहे हैं. चाको ने शीला दीक्षित को ये भी याद दिलाया है कि प्रवक्ताओं पर लगाम कसने का काम अध्यक्ष का होता है.
क्या चाको के इस व्यवहार को शीला दीक्षित के पर कतरने जैसी स्थिति समझी जा सकती है? जो कुछ पीसी चाको कर रहे हैं या करना चाहते हैं, उससे कांग्रेस हासिल क्या हो रहा है? क्या ये सब राहुल गांधी की शह पर उन्हें भरोसे में लेकर किया जा रहा है?

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