कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस सरकार गिरी तो इसके कई मायने
Latest News
bookmarkBOOKMARK

कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस सरकार गिरी तो इसके कई मायने

By Bbc calender  07-Jul-2019

कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस सरकार गिरी तो इसके कई मायने

कर्नाटक में जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) और कांग्रेस के गठबंधन वाली सरकार के एक दर्जन से ज़्यादा विधायकों के इस्तीफ़ा देने की वजह से राज्य सरकार संकट में घिर गई है. माना जा रहा है कि 12 जुलाई से शुरू हो रहे विधानसभा सत्र के दौरान भारतीय जनता पार्टी कर्नाटक की कुमारस्वामी सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव भी ला सकती है.
इन परिस्थतियों में एक और सवाल सामने है कि क्या कर्नाटक में गठबंधन सरकार की खस्ता हालत देश में गठबंधन सरकारों की बुरी स्थिति और उनकी समाप्ति की ओर इशारा कर रही है? हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और मज़बूत राजनीतिक दल बनकर उभरी है. जिस तरह साल 1971 में पाकिस्तान से युद्ध जीतने के बाद सत्ता का केंद्र इंदिरा गांधी हो गई थीं ठीक उसी तरह मौजूदा समय में मोदी ने सत्ता का एकीकरण कर दिया है.
इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद सत्ता में आईं थीं और बहुत कम वक़्त ही बीता था कि उन्हें 'गूंगी गुड़िया' बता दिया गया. यह वो वक़्त था जब कांग्रेस पार्टी बहुत कमज़ोर नज़र आ रही थी और साल 1967 में भारत में गठबंधन की राजनीति की शुरुआत भी हुई.
इसके परिणाम स्वरूप संयुक्त विधायक दल (एसवीडी) सरकार का उदय हुआ जोकि भारतीय क्रांति दल, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और भारतीय जन संघ (भारतीय जन संघ से ही आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी का निर्माण हुआ) का गठबंधन था.
लेकिन जब उन्होंने पाकिस्तान का विभाजन करके बांग्लादेश बनाया तो इंदिरा गांधी ने न केवल बहुमत के साथ देश की केंद्रीय सत्ता को हासिल किया बल्कि अलग-अलग राज्यों में मौजूदा गठबंधन की सरकारों को भी धाराशायी करने का काम किया.
संयुक्त विधायक दल की सरकारें उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, पंजाब, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु और केरल में गिर गईं. केरल को छोड़कर हाल तक में पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थिति मज़बूत थी. वहीं तमिलनाडु में द्रविड़ पार्टियों का शासन बना रहा.
गठबंधन की सरकारें बनने का दूसरा चरण 1989 में शुरू हुआ. यह वो वक़्त था जब कई गठबंधन पार्टियों का उदय हुआ. इन पार्टियों ने न केवल राज्य स्तर पर सत्ता का स्वाद चखा बल्कि केंद्रीय स्तर पर भी सत्ता में रहीं.
1989 से शुरू हुआ गठबंधन का ये दौर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए के बनने तक रहा जिसने साल 2004 और 2009 में केंद्रीय स्तर पर दो सफल कार्यकाल पूरे किये. यह सिलसिला मोदी सरकार के साल 2014 में जीत तक भी बना रहा और अब तो हाल ही में हुए चुनावों में उन्होंने अपनी स्थिति को और मज़बूत कर लिया है.
मई में हुए चुनावों से एक साल पहले जब बीजेपी कर्नाटक विधानसभा चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी तो कांग्रेस ने बीजेपी के कांग्रेस मुक्त भारत के कैंपेन को समाप्त करने का फ़ैसला किया. इसका नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस पार्टी ने कुछ ऐसे फ़ैसले लिए जिस पर यक़ीन करना मुश्किल था, मसलन पार्टी ने जेडीएस के एचडी कुमारास्वामी को मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव दे दिया.
चुनाव में भले ही जेडीएस ने 37 सीटें जीतीं और ये कांग्रेस की जीती सीटों से शायद आधा ही थीं लेकिन कांग्रेस ने मुख्यमंत्री की कुर्सी का प्रस्ताव दे दिया. यह फ़ैसला चौंकाने वाला था क्योंकि ये वही दो पार्टियां थीं जो सालों से दक्षिणी कर्नाटक में एक-दूसरे की 'दुश्मन' थीं.
कर्नाटक में इस गठबंधन सरकार को बने अभी 14 महीने ही हुए हैं और जैसी अभी स्थिति है उसे देखकर तो लगता है कि जेडीएस-कांग्रेस का गठबंधन ख़तरे में है. सरकार के 13 विधायक विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे चुके हैं.
इसके पीछे राज्य में बीजेपी के ऑपरेशन कमल का महत्वपूर्ण योगदान रहा. जो सदस्य इस्तीफ़ा देकर आएंगे उन्हें भविष्य में बीजेपी के टिकट से चुने जाने का वादा किया गया है. ठीक ऐसा प्रयोग 2008 में भी हुआ था, जब कर्नाटक में बीजेपी सत्ता में चुनकर आई थी.
तो ऐसे में जो परिस्थितियां बन रही हैं क्या उनके आधार पर ये कहा जा सकता है कि ये देश मज़बूत एकल राजनीतिक पार्टी की ओर बढ़ रहा है? क्या इसका मतलब ये निकाला जाना चाहिए कि गठबंधन सरकारों का दौर ख़त्म होने की कगार पर है?
धारवाड़ विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान विभाग के प्रोफ़ेसर हरीश रामास्वामी कहते हैं "एक लिहाज़ से ऐसा है. साल 2019 का लोकसभा चुनाव और उसके नतीजों से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि भारत में राजनीतिक पार्टियों ने अपनी साख गंवाई है और साथ ही बीजेपी से मुक़ाबला करने की क्षमता भी मौजूदा समय में ऐसा कोई नेतृत्व नहीं है जो मोदी के नेतृत्व के समकक्ष खड़ा हो सके और या फिर उसे चुनौती दे सके."
राजनीतिक मामलों के जानकार महादेव प्रकाश कर्नाटक में साल 1983 में हुए पहले गठबंधन की ओर इशारा करते हैं. यह गठबंधन रामकृषण हेगड़े के नेतृत्व वाली जनता पार्टी-क्रांतिरंग के बीच हुआ था. इसे बीजेपी और कम्यूनिस्ट पार्टी का भी समर्थन था. लेकिन जब साल 1984 में लोकसभा के चुनाव हुए तो यह गठबंधन बुरी तरह पिछड़ गया क्योंकि कांग्रेस को 28 लोकसभा सीटों में से 24 सीटें मिली थीं.
आज भारत लौटेंगे CM कुमारस्‍वामी, असंतुष्‍ट विधायकों को मनाने के लिए इस फॉर्मूले पर हो रहा विचार
इसके बाद जब साल 2004 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में सामने आई तो कांग्रेस-जेडीएस का गठबंधन भी बिखर गई. एचडी कुमारस्वामी ने गठबंधन की सरकार चलाने के लिए साल 2006 में बीजेपी के साथ हाथ मिलाया यह भी बिखर गई.
महादेव प्रकाश कहते हैं जेडीएस और कांग्रेस का गठबंधन गठबंधन सरकारों के संदर्भ में तीसरा प्रयोग रहा है. अगर बात साल 2019 के लोकसभा चुनावों की करें तो पूरे देश की जनता ने गठबंधन को पूरी तरह से नकार दिया. लोगों ने तय किया कि एक पार्टी की सरकार ही सबसे अच्छी होगी क्योंकि गठबंधन लोगों को शासन नहीं दे पाता."
वहीं मैसूर यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र अस्सादी महादेव प्रकाश की बातों से सहमति नहीं रखते हैं. वो कहते हैं "गठबंधन की सरकार तमाम राजनीतिक और अन्य दूसरे मतभेदों के बादवूद काम करने में सक्षम थी. वैचारिक रूप वे धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में थे. यह तमाम पिछली राजनीतिक लड़ाइयों और अहंकार का टकराव ही है जिसने मतभेद पैदा किए हैं."
हालांकि प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र अस्सादी ये ज़रूर मानते हैं कि मौजूदा गठबंधन सफल नहीं रहा है. लेकिन वो इसके पीछे बीजेपी को मानते हैं. उनका कहना है "बीजेपी हिंदू जाति समूहों का संगठन बनाने में कामयाब रही है. बीजेपी ने सभी हिंदू जातियों को एक मंच पर लाने का काम किया है. जोकि बीजेपी के हिंदुत्व से बिल्कुल अलग है. कर्नाटक में अब पहले से कहीं ज़्यादा हिंदूकरण हुआ है. हालांकि जब मैं ये कहता हूं तो मेरा मतलब हिंदू धर्म से बिल्कुल भी नहीं है. भाजपा का विभिन्न जातियों को एक मंच पर लेकर आना कांग्रेस और जेडीएस के सामाजिक आधार के ख़िलाफ़ गया."

MOLITICS SURVEY

मॉब लिंचिंग किस वजह से हो रही है ?

दाढ़ी
  5.66%
टोपी
  9.43%
राष्ट्रवाद
  84.91%

TOTAL RESPONSES : 53

Raise Your Voice
Raise Your Voice 

Suffering From Problem In Your Area ? Now Its Time To Raise Your Voice And Make Everyone Know