सरकार की आँखें खोलने के लिए जनता का जागना ज़रूरी
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सरकार की आँखें खोलने के लिए जनता का जागना ज़रूरी

Author: calender  09 Jan 2018

सरकार की आँखें खोलने के लिए जनता का जागना ज़रूरी

भारत के सभी राजनैतिक दलों ने अपने-अपने हिसाब से सत्य, ईमानदारी और न्याय की परिभाषाएं तय की हुई हैं। भारत की जनता इन्हीं परिभाषाओं में कन्फ्यूज होती‌ रहती है। ईमानदारी की नवीनतम परिभाषा के साथ 5 साल पहले राजनीति में आए अरविंद केजरीवाल आखिर क्यों बेईमान नजर आ रहे हैं? कुमार विश्वास आखिर क्यों उलझे हुए हैं? दोनों में कौन झूठा है? या दोनों मिलकर जनता को झूठा साबित कर रहे हैं? मोदी जी ने कब अपने वादे पूरे किए हैं? लोकतंत्र को सफल बनाने के लिए जरूरी है कि, लोकतांत्रिक गुणों की परिभाषाएँ जनता और नेता दोनों के लिए समान हों। लेकिन मुश्किल यह है की वर्तमान में ये परिभाषाएँ तय कौन करे। सत्ता आसीन लोग तो करेंगे नहीं! क्योंकि अब कोई भी राजनेता अपने पावर में दखल अंदाजी के शर्त पर कुछ भी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। कुर्सी का मोह है ही ऐसा! लोकतंत्र में जनता होना सबसे जिम्मेदारी का काम होता है। जनतंत्र के लिए जनता को शासन के प्रति जिम्मेदारी दिखानी ही पड़ेगी। लेकिन आखिर क्या कारण है कि हम हर पांच साल में नये या यूँ कहें झूठे वादों पर भरोसा कर लेते हैं? आखिर क्या कारण है कि हम पिछले पांच साल के अधूरे वादों को बिना सवाल किए भुल जाते हैं? क्या हम भोले हैं, भावुक हैं, या बेवकूफ; जो हमारे साथ हो रही धांधली से समझौता कर लेते हैं। चुनाव केवल पार्टियों के लिए चुनाव क्यों है? ये जनता के लिए चुनाव क्यों नहीं है? पार्टियों के मेनिफेस्टो के सामने हमारा मैनिफेस्टो क्यों नहीं हो? सरकारी कार्यों पर हम मुकम्मल निगरानी क्यों नहीं रखते? समझना होगा कि सत्ता संभाले पार्टियों के कार्यकाल के साथ सत्ता संभाले पार्टियों के आंतरिक फैसलों पर हमारा पूरा ध्यान होना चाहिए। उदाहरण स्वरूप दिल्ली में अगर आम आदमी पार्टी दो गलत लोगों को राज्य सभा भेज रही है, तो हम विरोध क्यों नही कर रहे? हम आवाज क्यों नहीं उठा रहे की ये लोग हमारा प्रतिनिधित्व करने के लायक नहीं है। ये झगड़ा केजरीवाल और कुमार विश्वास के बीच का नहीं। बल्कि दिल्ली की जनता और "आप" के बीच का है। योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को बाहर निकालने पर जनता ने सवाल किया होता तो आज "आप" यहां तक नहीं पहुंचती। 2014 लोकसभा चुनाव में हमारी गूंगी उम्मीदों ने BJP को इतनी हिम्मत दे दी की जम्मू-कश्मीर में PDP से मिलकर सरकार बना ली गई, जबकि दोनों पार्टियों की विचारधारा एक दूसरे से बिल्कुल अलग है। चुनाव जीतने के बाद योगी आदित्यनाथ और गिरीराज सिंह जैसे लोगों को संवैधानिक पद दे दिया गया। हमारे चुप रहने की आदत हर रोज इन्हें गलती करने की ‌नई हिम्मत देती जा रही है। सिमटते हुए कांग्रेस पर अगर हमने समय रहते सवाल उठाए होते तो 10 साल के UPA के कार्यकाल में भारत पर्याप्त तरक्की भी करता और आज हमारे लोक सभा में मज़बूत विपक्ष का कोई चेहरा भी होता। अगर जनता ने सवाल उठाए होते तो देश की सबसे पुरानी पार्टी इस कदर कमज़ोर नहीं हो जाती। पार्टियाँ अहंकार के कारण भी कमज़ोर होती हैं और राजनैतिक दलों का अहंकार हमारी चुप्पी पर निर्भर करता है। सरकार के कामकाज पर नजर रखिए, सवाल उठाइए; जनहित के फैसलों पर भी और कांग्रेस, BJP या 'आप' हर सत्ताधारी पार्टी के आंतरिक फैसलों पर भी। जरूरत पड़ने पर जोरदार विरोध भी करिये। ऐसा नहीं करने से हम, आप और ये देश ही नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता खतरे में चली जाती है। समाज में सत्य, ईमानदारी और न्याय को पारिभाषित करने के लिए मानवता का आधार रखेंगे तब ही हमारे और आपके होने की शर्ते सुनिश्चित रह पाएंगी।

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