ख़तरे में अभिव्यक्ति
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ख़तरे में अभिव्यक्ति

Author: Neeraj Jha calender  19 Jul 2018

ख़तरे में अभिव्यक्ति

कल्पना कीजिए एक परिवार जिसका एक मुखिया है, जो परिवार के लिए फैसले लेता है। लेकिन सोचिए कि वह मुखिया परिजनों की बात सुने बिना फैसले ले या परिजनों की आवाज़ दबा दे तो क्या होगा। परिवार टूट जाएगा। हालातों पर गौर करें तो देश उसी परिवार जैसा नज़र आ रहा है। देश के मुखिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को प्रधान सेवक कहते हैं, लेकिन उन्हीे के दल के प्यादे समय समय पर तानाशाही रवैये का उदाहरण पेश करते हैं। पशोपेश में लोग हैं - जाएँ तो कहाँ?, कहें तो किससे?

लोकतंत्र का अर्थ होता है - लोगों के लिए, लोगों के द्वारा, लोगों का शासन। एक ऐसी व्यवस्था, जिसमें सरकार का चुनाव मतदान के ज़रिए जनता करती है। इस तरह, शासन की सर्वोच्च शक्ति जनता के हाथों में ही होती है। जनता के पास अधिकार होता है, शासकों को चुनने का भी और उनसे सवाल करने का भी। सवाल करने का यह अधिकार ही जनता की ताकत का प्रमाण है। लेकिन राजनैतिक गलियारों में जनता की इस ताकत को दबाने की कोशिशें समय-समय पर की जाती रही है। पिछले कुछ सालों में ऐसी कोशिशों की संख्या बढ़ी है।

राजस्थान का विवादित विधेयक हाल ही में राजस्थान सरकार ने लोकसेवकों को बचाने के लिए एक अध्यादेश जारी किया था। इसके अनुसार, किसी भी लोकसेवक, जज या मजिस्ट्रेट पर बिना सरकार की मंजूरी के न तो एफआईआर दर्ज किया जा सकेगा न ही जाँच की जाएगी। कोई कोर्ट किसी लोकसेवक के खिलाफ आदेश नहीं दे पाएगी। अध्यादेश के अनुसार प्रतिबंध मीडिया पर भी लगा। मीडिया भी बिना राजनैतिक अनुमति के किसी लोकसेवक पर आरोप नहीं लगा सकती। राजस्थान के गृहमंत्री के अनुसार इमानदार 'बाबू' लोगों को काम करने में दिक्कत न आए – इसलिए यह अध्यादेश लाया गया।

गृहमंत्री साहब के अनुसार लोगों द्वारा शिकायतों के डर से 'बाबू' लोग काम करने में हिचकते हैं। लेकिन गृहमंत्री साहब इसका अर्थ यह हुआ कि आप 'बाबू' लोगों को डरपोक मानते हैं। या फिर न्याय व्यवस्था में आपका और 'बाबू' लोगों का यक़ीन नहीं है। सरकार फैसले के वृहत पक्ष को समझना ही नहीं चाह रही या फिर जान बूझकर नज़रअंदाज़ कर रही है।

कलाकारों के ख़िलाफ आपत्तिजनक बयानबाज़ी की शुरुआत राजस्थान से ही हुई थी। राजपूत समुदाय के कुछ लोगों की करणी सेना और पद्मावती किसी परिचय का मोहताज़ नहीं। मलिक मोहम्मद जायसी के पद्मावत की चरित्र "रानी पद्मिनी" और अलाउद्दीन ख़िलज़ी को लेकर बनाई गई संजय लीला भंसाली की फिल्म विवादों के रिकॉर्ड तोड़ती नज़र आ रही है। फिल्म की शूटिंग के दौरान ही राजस्थान में करणी सेना के द्वारा सेट पर तोड़ फोड़ की गई थी। और अब जब फिल्म बनकर तैयार है तो इसके रिलीज़ को लगातार खिसकाया जा रहा है। इस दौरान, करणी सेना और अन्य लोगों द्वारा फिल्म से जुड़े कलाकारों को धमकियाँ दी गई। हद तब हो गई, जब राजनेता भी इस विवाद को बढ़ाने में लग गए। हरियाणा बीजेपी के मीडिया कॉर्डिनेटर सूरज पाल अमु ने दीपिका पादुकोन और संजय लीला भंसाली के सिर काटने पर दस करोड़ रुपए देने की बात कही है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जी ने कहा कि राष्ट्रमाता पद्मिनी का अपमान वे कदापि बर्दाश्त नहीं करेंगे। और मध्य प्रदेश में फिल्म पर बैन भी लगा दिया। नित्यानंद का अहंकार इस कड़ी की तीसरी घटना है। बिहार बीजेपी के अध्यक्ष नित्यानंद ने प्रधानमंत्री मोदी से सवाल पूछने वालों का हाथ काट देने की बात कही। अपने बयान पर बढ़ते हुए विवाद को देखकर उन्होंने माफ़ी ज़रूर माँग ली, लेकिन क्या शब्दों ने लोकतंत्र की आत्मा में जो घाव किया है क्या नित्यानंद की माफ़ी से वह भर जाएगा।

नित्यानंद राजनेताओँ की उस मानसिकता को दर्शाते हैं, जो जनता को निरीह प्रजा और स्वयं को राजा समझते हैं। तीनों ही घटनाओं में अभिव्यक्ति को दबाने का प्रयास होता दिख रहा है। जनता को गूँगा और बहरा बनाया जा रहा है। कलाकारों की रचनात्मक स्वतंत्रता को सीमित किया जा रहा है। ये लक्षण लोकतंत्र के लिए घातक हैं। इन लक्षणों के विरुद्ध लोगों को एकजुट होना पड़ेगा।

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