"एंटी ब्लैक मनी डे" या "धोक़ा दिवस" - “समीक्षा” की बजाय हो रहे हैं “समारोह”
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"एंटी ब्लैक मनी डे" या "धोक़ा दिवस" - “समीक्षा” की बजाय हो रहे हैं “समारोह”

Author: Neeraj Jha   17 Jul 2018

"एंटी ब्लैक मनी डे" या "धोक़ा दिवस" - “समीक्षा” की बजाय हो रहे हैं “समारोह”

क्या आपने कभी रावण के जन्मदिवस पर समारोह आयोजित करने की बात सोची? क्या सुनामी जिसने लाखों ज़िंदगियों को लील लिया था के आगमन के दिन को उत्सव की तरह से मनाने का ख़्याल आपके ज़हन में आया? या फिर क्या अपेक्षित सफलताओं को न पाकर लगातार असफल होकर भी आपने अपने जन्मदिवस को सेलीब्रेट करने की हिम्मत की? इन सब प्रश्नों का जवाब शायद “नहीं” ही होगा। बहुत सामान्य है कि अगर ज़िंदगी में सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा हो तो जन्मदिवस मनाने का मन नहीं करता। किसी भी ऐसे व्यक्ति के जन्मदिवस पर या दुर्घटनाओं पर समारोह आयोजित नहीं किए जाते, जिससे समाज को क्षति पहुँची हो। न तो ज़मीर इसकी गवाही देता है और न ही दिल इसकी हिम्मत। लेकिन लगभग 100 व्यक्तियों की मौत के ज़िम्मेदार, अर्थव्यवस्था के त्वरित गिर जाने के सबब और लाखों लोगों की नौकरियों को लील जाने वाले नोटबंदी को जिस तरह से समारोह बनाया जा रहा है वह दुखद है। 8 नवंबर 2016 की रात 8 बजे प्रचलन में मौज़ूद 500 रुपए और 1000 रुपए के नोटों को प्रचलन से हटा दिया गया। बिना किसी तैयारी के सरकार ने लगभग 86 प्रतिशत महत्व के नोटों को अमान्य करार दे दिया। इसके बाद लगभग डेढ़ महीने तक देश की जनता ने और बैंक कर्मचारियों ने असीम दुख और पीड़ा को बर्दाश्त किया, केवल सरकार के वायदों पर विश्वास करके। लेकिन सरकार के अधिकांश वायदों की तरह नोटबंदी करते हुए किए गए वायदे भी खोखले साबित हुए। कालाधन समाप्त हो जाएगा, अर्थव्यवस्था मजबूत हो जाएगी, सीमा पार से घुसपैठ ख़त्म हो जाएगा, नक्सलवाद की रीढ़ टूट जाएगी – इस तरह के रंगीन सपने दिखाकर लोगों से सरकार ने नोटबंदी का समर्थन चाहा। घण्टों बैंक और एटीएम की लाइन में लगे हुए लोगों को सैनिकों की कुर्बानियों के किस्से सुनाए गए। फैसले का विरोध करने वालों को गद्दार कहा गया। लेकिन धरातल पर नोटबंदी के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु कोई कोशिश नहीं की गई। बल्कि देश को राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रद्रोह के बीच उलझा कर रख दिया गया। लेकिन आज जबकि नोटबंदी की सोची समझी दुर्घटना को एक साल हो गए, तो सरकार के वायदों की सारी असलियत खुल के सबके सामने आ चुकी है। बात कालाधन समाप्त करने की की गई, लेकिन नोटबंदी के कारण काले धन के स्वामियों की बजाय उन गृहणियों के बचत पर डाका डाला गया जो अप्रिय समय में अपने ही परिवार की मदद के लिए पाई पाई जोड़ा करती थी। 15.6 लाख करोड़ रुपए की राशि जिसे अमान्य करार दे दिया गया था में से लगभग 14 लाख करोड़ बैंक में वापिस आ गए। कहाँ गया कालाधन? क्या भारत में कालाधन था ही नहीं? या फिर सरकार के सहयोग से काले धन को सफ़ेद कर लिया गया। बात की जा रही थी कि अर्थव्यवस्था मज़बूत होगी, भारतीय बाज़ार संगठित होगा। अर्थव्यवस्था के संगठित होने पर GDP पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। लेकिन सकल घरेलु उत्पाद तीन सालों के निम्नतम स्तर तक आ गया। अर्थव्यवस्था चरमरा गई। महँगाई छप्पर ही नहीं बल्कि आसमान फाड़कर बढ़ी। बात की जा रही थी सीमा पार से समर्थित आतंकी गतिविधियों पर काबू पाने की, लेकिन इस मोर्चे पर भी नोटबंदी को नाकामी ही हासिल हुई। एनडीटीवी के आंकड़ों के मुताबिक नोटबंदी से पहले और इसके बाद के 10 महीनों में घाटी में होने वाली आतंकी गतिविधियों में 38 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है और नोटबंदियों के बाद के 10 महीनों में पहले की अपेक्षा सुरक्षा कर्मियों की मौत में 2 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ। बात अगर नक्सलवाद की करें तो भी नोटबंदी का बहुत बड़ा प्रभाव देखने को नहीं मिला। South Asia Terrorism Portal के अनुसार नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा कर्मियों की मौत में 82 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। गौरतलब है कि नोटबंदी करते हुए किए गए सरकार के सारे वायदे बचपन के इश्क़ के वायदों की तरह टूट गए। लेकिन समस्या ये है कि सरकार फैसले की विफलताओं को स्वीकार करने या फिर इसके क्रियान्वयन पर पुनर्विचार करने की बजाय उत्सव मना रही है। उत्सवों से हमें कोई परहेज़ नहीं है, लेकिन उत्सव मनाने का कारण तो हो। सच से मुँह मोड़ लेने से विफलताएँ छिप नहीं जाएँगी। सरकार को ध्यान रखना चाहिए कि सिद्ध होने से पूर्व सच को भी संदेह की दृष्टि से ही देखा जाता है और देखा जाना भी चाहिए जबकि नोटबंदी के सारे वायदे झूठे सिद्ध हो चुके हैं। वास्तव में 8 नवंबर की प्रासंगिकता धोक़ा दिवस के रूप में ही है, न कि एंटी ब्लैक मनी डे के रूप में।

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