थोथा कारतूस साबित हुई नोटबंदी
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थोथा कारतूस साबित हुई नोटबंदी

Author:   08 Nov 2017

थोथा कारतूस साबित हुई नोटबंदी

मोदी सरकार नोटबंदी के तात्कालिक फायदे बताने से लगातार कन्नी काटती रही है। हालांकि जब आठ नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री ने इस कदम का एलान किया था तो तीन बड़े लक्ष्यों की पूर्ति अपना मकसद बताया था। पहला कालेधन का खात्मा, दूसरा नकली करेंसी पर रोक और तीसरा- नक्सलियों व आतंकवादियों की कमर तोड़ना। नोटबंदी के एलान की वर्षगांठ पर साफ हो चुका है कि कम से कम इन तीनों में से तो किसी भी मकसद को अपने इस बेतुके फैसले से मोदी सरकार हासिल नहीं कर पाई है। कुछ नहीं सूझ रहा तो अब सरकार के कारिंदे दुहाई दे रहे हैं कि नोटबंदी के दीर्घकाल में फायदे होंगे। साथ ही इससे डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा मिला है और ऐसा लेन-देन कालेधन की अर्थव्यवस्था को रोकने में सहायक होता है। नोटबंदी का फैसला देश के शिखर बैंक का अपना नहीं था। न वित्त मंत्री का ही यह फैसला था। यह अकेले प्रधानमंत्री का अपना फैसला था। नि:संदेह इसे साहसिक फैसला कहा जा सकता है। पर ऐसे साहस का क्या फायदा जिसमें तैराक का डूबना साफ नजर आता हो। अपने देश में कालेधन पर रोक के उपायों को लेकर कई बार अध्ययन हुए हैं। हर बार यही निष्कर्ष निकला कि करेंसी यानी नोट की शक्ल में कालाधन पांच छह फीसद से ज्यादा है ही नहीं। ज्यादा कालाधन तो अचल संपत्ति और सोने-चांदी में खपा है। तो भी प्रधानमंत्री ने ऐसा प्रयोग कर दिया जो अंतत: देश की अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह ही साबित हुआ। सरकार ने नोटबंदी के मामले में लगातार गोपनीयता का सहारा लिया। पारदर्शिता, शुचिता और जनकल्याण की दुहाई देने वाली मोदी सरकार नोटबंदी की मियाद खत्म हो जाने के महीनों बाद तक भी यही बताने को तैयार नहीं हुई कि पांच सौ और एक हजार रुपए के कितने करेंसी नोट बैंकों में वापस आए हैं। बताती तो उसके फैसले का मजाक बनता। बहरहाल देर-सवेर रिजर्व बैंक को इसका खुलासा करना पड़ा और उसने मान लिया कि कुल करेंसी के 99 फीसद नोट वापस आ गए। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में जब इस मुद्दे पर सुनवाई हो रही थी तो सरकार के वकील दुहाई दे रहे थे कि प्रतिबंधित करेंसी के एक चौथाई नोट वापस आएंगे ही नहीं। यानी सरकार का यह अनुमान गलत साबित हो गया। जाली नोट का आंकड़ा तो सरकार आज भी देने को तैयार नहीं। किस आतंकवादी और नक्सलवादी संगठन का कितना काला धन उसने पकड़ा, इस सवाल को तो सुन कर ही वित्त मंत्री और उनके अधिकारी बिदकते हैं। जाहिर है कि न उम्मीद के हिसाब से कालेधन पर अंकुश लगा और न आतंकवाद-नक्सलवाद की कमर ही टूट पाई। नकली करेंसी तो खैर न ज्यादा थी और न पकड़ में आ पाई। हां, सरकारी बैंकों में पहुंचा कर इसे रखने वाले असली करेंसी के हकदार जरूर बन गए। अब खुलासा हो रहा है कि बैंकों में जमा प्रतिबंधित नोटों में कुछ नकली भी हैं। अब अपने वित्त मंत्री ने नया पैंतरा चला है। उनका कहना है कि बैंकों में सारा पैसा जमा हो जाने का यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि सारा धन सफेद हो गया। सरकारी एजंसियां जांच कर रही हैं और इसमें बड़ी मात्रा में ऐसा धन है जिस पर आयकर और अर्थदंड वसूला जाएगा। पर आंकड़ों से लगता नहीं कि तमाम कवायद के बावजूद सरकार जो कमाई करेगी उससे नई करेंसी की छपाई और उसे देश के कोने-कोने तक पहुंचाने पर आए भारी भरकम खर्च की भी उससे भरपाई हो पाएगी। अब एक और पहलू की पड़ताल भी कर ली जाए। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नोटबंदी से आर्थिक विकास दर में गिरावट और बेरोजगारी बढ़ने का खतरा बताया था। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी खिल्ली उड़ाई थी। पर मनमोहन की दोनों आशंकाएं अंतत: सही साबित हो गईं। नोटबंदी के बाद विकास दर में तो दो फीसद की गिरावट आई ही, बेरोजगारी की समस्या भी पहले से ज्यादा विकराल हुई है। उसके बाद अधूरी तैयारी और हड़बड़ी में लागू की गई जीएसटी की व्यवस्था ने तो कारोबार को बुरी तरह प्रभावित किया है। तभी तो भाजपा के अपने ही सांसद शत्रुघ्न सिन्हा डंके की चोट पर कह रहे हैं कि नोटबंदी के बाद जीएसटी का आना करेला नीम चढ़ा कहावत को चरितार्थ करता है। बैंकों में जनधन खाते खुलवा कर नरेंद्र मोदी ने खूब वाहवाही बटोरी थी। पर नोटबंदी में काला धन पकड़ने के उनके सपने को ध्वस्त करने में इन खातों की भी अहम भूमिका रही। रही डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने की बात तो यह भी खुशफहमी ही है। जिस देश में अभी हर जगह बिजली भी न पहुंची हो वहां इंटरनेट की कनेक्टीविटी और डिजिटल लेन-देन थोपना आत्मघाती ही माना जाएगा। यह रोजमर्रा बैंकों में उनके सर्वर डाउन रहने के अनुभव से बखूबी समझ भी आता है। अब तो सरकारी आंकड़े भी साफ दिखा रहे हैं कि नोटबंदी के दौरान जब नकदी का संकट था तो जरूर लोग डिजिटल लेन देन को मजबूर थे। पर उस वक्त दिखी बढ़त अब फिर लगातार ढलान पर है। रही बैंकों के वित्तीय संकट के दूर होने की बात। यह सही है कि बढ़ते एनपीए के कारण सरकारी बैंक नकदी के संकट से जूझ रहे थे। नोटबंदी ने उनकी तिजोरियों को लबालब कर दिया। लेकिन वे अब दूसरी समस्या से जूझ रहे हैं। उनके पास जमा रकम बिना इस्तेमाल पड़ी हुई है। मध्यम और लघु तबके के लोग कर्ज लेने आ ही नहीं रहे। बड़े लोगों को कर्ज देने का अर्थ है कि अपनी रकम को पहले की तरह फिर डुबा देना। अब बैंकों का संकट और बढ़ा है। बचत खातों में जमा रकम पर थोड़ा ही सही पर ब्याज तो उन्हें चुकाना ही है। इससे उनकी आर्थिक सेहत और खराब होगी। सरकारी बदइंतजामी भी नोटबंदी में साबित हो गई। सरकार ने अब 35 हजार डमी कंपनियों का पंजीकरण रद्द कर देने का दावा किया है। इन कंपनियों के 58 हजार बैंक खातों का नोटबंदी के दौरान पांच सौ और एक हजार की करेंसी जमा करने में खूब इस्तेमाल हुआ था। सरकारी आंकड़े के मुताबिक कुल 17 हजार करोड़ की रकम आई थी। पर यह रकम तो इन खातों से निकल भी चुकी है। अब लकीर पीटने से सरकार को क्या मिलेगा? हां, आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआइ और दूसरी सरकारी एजंसियों के अफसरों के पौ-बारह जरूर हो रहे हैं। कौन इस हकीकत को नकार सकता है कि इंस्पेक्टर राज में भ्रष्टाचार कम नहीं होता बल्कि बढ़ता ही है।

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