राजनीति में स्वच्छता अभियान
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राजनीति में स्वच्छता अभियान

Author: calender  07 Nov 2017

राजनीति में स्वच्छता अभियान

राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए एक अहम बात सुप्रीम कोर्ट ने कही है कि दागी नेताओं के मुकदमों के जल्द निपटारे के लिए विशेष अदालतें बनें और उनमें केवल नेताओं के मुकदमे ही सुने जाएं। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अदालतें गठित करने पर छह सप्ताह में सरकार को योजना पेश करने को कहा है। भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति में अपराधीकरण लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। लोकतंत्र में चुनावी मैदान में उतरने और वोट देने का हक नागरिकों को हासिल है। बिना किसी भेदभाव के, सबको समान अवसर मिले, ऐसी भावना इन अधिकारों के पीछे है। लेकिन बीते कुछ बरसों में यह प्रवृत्ति देखी गई कि जेल की सलाखों के पीछे से कोई चुनाव लड़ रहा है, तो कोई सजा काटकर चुनावी मैदान में उतरा है। किसी पर गंभीर आरोप हैं, लेकिन वह संसद या विधानसभा का सदस्य बना है। इन सबको राजनीति में आई गिरावट से जोड़ा गया, नैतिकता, शुचिता की दुहाइयां दी गईं। हमने अपराधीकरण के कड़वे फल को तो देख लिया, लेकिन यह नहीं देखा कि इसके बीज कहां रोपे गए हैं। यह बात अब हमें बहुत मामूली लगती है कि बड़े-बड़े नेताओं से लेकर छुटभैये नेताओं के आसपास चमचों की फौज होती है, उनके अपने लाठीधारी, बंदूकधारी गुंडे होते हैं, जो विपक्षी दलों के गुंडों से लड़ने का काम करते हैं। कई बार इन गुंडों को पालने में पूंजीपतियों का सहयोग भी रहता है। बाहुबल, धनबल और सत्ता का बल इन तीनों के मेल से राजनीति में लगातार गिरावट आई है। पंूजीपतियों ने पूंजी के दम पर राज्यसभा, विधानपरिषद आदि के दरवाजे अपने लिए खुलवाए, तो भला बाहुबली पीछे क्यों रहें, उन्होंने भी नेताओं की मदद के बजाए खुद ही सत्ता के अखाड़े में कूदने का रास्ता अपनाया। अब जो परिदृश्य है, वह हमारे सामने है। संसद और विधानसभाओं में 15 सौ से अधिक दागी नेता हैं, जिनके कारण राजनीति के शुद्ध चरित्र पर संदेह होना लाजिमी है। लूट, हत्या, बलात्कार, दंगे-फसाद, भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपी या दोषी संसद, विधानसभाओं में पहुंचने लगे तो आम जनजीवन में भी कानून के लिए इज्जत कम होने लगी। नियमों काउल्लंघन, कानून तोड़ना साधारण व्यवहार में शामिल होने लगा। राजनीति में अपराध की यह गंदगी पानी में तैरती काई के समान खटकने लगी है। इसलिए समय-समय पर यह सवाल उठाया जाता है कि क्यों न अपराध के आरोपी या दोषियों को राजनीति से ही दूर कर दिया जाए। भाजपा नेता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने इस मुद्दे पर एक याचिका दायर की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की पीठ ने विशेष अदालत बनाने के लिए कहा, साथ ही चुनाव लड़ते समय नामांकन में आपराधिक मुकदमे का ब्योरा देने वाले 1581 विधायकों और सांसदों के मुकदमों का ब्योरा और स्थिति भी पूछी है। श्री उपाध्याय ने सजायाफ्ता जनप्रतिनिधियों के चुनाव लड़ने पर आजीवन रोक लगाने की मांग की है। चुनाव आयोग की राय भी यही है। मौजूदा कानून में सजा के बाद जेल से छूटने के छह वर्ष तक चुनाव लड़नेे की अयोग्यता है। राजनीति को साफ-सुथरा बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठाना जरूरी है। लेकिन इसमें यह ख्याल भी रखना होगा कि कहीं उससे नागरिक अधिकारों का उल्लंघन ही न हो जाए। हत्या, दंगे, बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के दोषियों को तो बेशक जनप्रतिनिधि बनने से रोका जाना चाहिए, लेकिन कई बार साजिशन किसी को अपराध में फंसा दिया जाता है। राजनीतिक दुश्मनी के कारण झूठे मुकदमे चला कर सजायाफ्ता भी बना दिया जाता है। ऐसे में उनके चुनाव लड़नेे पर रोक लगाना क्या सही होगा, इस पर विचार करना चाहिए। मुकदमों के जल्दी निपटारे के लिए विशेष अदालतों को बना भी दिया गया, तो उन्हें राजनीतिक प्रभाव या पूर्वाग्रहों से दूर रखने की चुनौती बनी रहेगी। क्या विशेष अदालत का फैसला ही अंतिम होगा या इसमें भी सर्वोच्च अदालत तक जाने का प्रावधान रहेगा? अगर विशेष अदालत में दोषी पाए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट से बरी होते हैं, तब भी क्या चुनाव लड़नेे पर रोक रहेगी? ऐसे कुछ सवालों, संदेहों के जवाब ढूंढने से ही राजनीति का सफाई अभियान अच्छे से चल पाएगा।

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