नहीं टूट रहा नोटबंदी कांड का भ्रमजाल
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नहीं टूट रहा नोटबंदी कांड का भ्रमजाल

Author: calender  07 Nov 2017

नहीं टूट रहा नोटबंदी कांड का भ्रमजाल

सालभर होने को आया लेकिन अब तक पुराने नोटों की गिनती का काम चालू बताना पड़ रहा है. पुराने नोटों के असली नकली होने के सत्यापन का काम भी अधूरा है. जब आंकड़े ही न हों तो नोटबंदी की सफलता विफलता की बात कैसे हो? सरकार अपने फैसले के सही होने का प्रचार कर रही है. और विपक्ष इस फैसले के भयावह असर होने के तर्क दे रही है. नोटबंदी के एक साल गुज़रने के दिन यानी आठ नवंबर को विपक्ष काला दिवस मनाएगी और सरकार जश्न. जनता इस विवाद की चश्मदीद बनेगी. वैसे शुरू से ही भुक्तभोगी जनता इस प्रकरण में मुख्य पक्ष है. सो उसे नोटबंदी के फायदे और नुकसान का हिसाब लगाने में ज्यादा दिक्कत आएगी नहीं. मसला इतना लंबा चौड़ा है कि जनता लाखों करोड़ की संख्या का अनुमान तक नहीं लगा सकती. इसीलिए इस हफ्ते कालादिवस और जश्न के दौरान होने वाले तर्क वितर्क के दौरान उसे जागरूक होने का मौका एकबार फिर मिलेगा. काला दिवस किस तरह से यह तर्क दिए जाएंगे कि सरकार के इस फैसले ने देश की अर्थव्यवस्था का भट्टा बैठा दिया. नोटबंदी के कारण देश में बहुसंख्य मज़दूरों, और दिहाड़ी कर्मचारियों के रोज़गार चौपट होने को याद दिलाया जाएगा. किसानों को भी याद दिलाया जाएगा कि वे किस तरह परेशान हुए थे. साथ में यह भी बताने की कोशिश होगी कि सरकार के इस फैसले से फायदा किसे हुआ. विपक्ष साबित करेगा कि नोटबंदी से अमीरों को फायदा हुआ. नोटबंदी से अमीरों को फायदा पहुंचने के यही तर्क सबसे सनसनीखेज और दिलचस्प होंगे. वैसे सबसे ज्यादा यह याद दिलाने की कोशिश होगी कि नोटबंदी का ऐलान करते समय जो मकसद बताया गया था वह कितनी बार बदला गया और क्यों बदलना पड़ा. जश्न का पक्ष नोटबंदी का जश्न किस तरह मनाया जाएगा इसका अंदाजा अभी लगाना मुश्किल है. वैसे भी सरकारी जश्न नोटबंदी को लेकर काला दिवस मनाने की प्रतिक्रिया में है सो जाहिर है कि नोटबंदी को घातक बताने के जो तर्क दिए जाएंगे, उनके काट के लिए सरकार की तरफ से वितर्क दिए जाएंगे. हालांकि न तो नोटबंदी के घातक साबित होने के तथ्य छुपे हुए हैं और न उसके फायदे के दावे अनसुने हैं. लिहाज़ा सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह नोटबंदी का कौन सा नया फायदा सोचकर लाती है. वैसे उसके पास एक तरीका यह भी है कि वह नोटों की गिनती और सत्यापन के काम का चालू होने की बात कहकर समीक्षा की तारीख को आगे खिसका दे. जनता के लिहाज़ से जनता यानी बहुसंख्य गरीब जनता ने तो नोटबंदी को सहा ही इसलिए था कि कुछ अमीरों को मारा जा रहा है. सो जनता को यह जानने का बड़ी बेसब्री से इंतजार है कि नोटबंदी से कितने अमीर पिटे. जनता की इस आकांक्षा को अगर सरकार या विपक्ष देख समझ रहे हों तो उन्हें भी इस मामले में अपने अपने तर्क बनाकर रख लेना चाहिए. बहुत संभव है कि जनता की आंकाक्षा के हिसाब से विपक्ष यह तर्क पेश करे कि मेहनतकश दिहाड़ी मज़दूर, किसान और छोटे कारोबारी किस बेरहमी से पिटे. और इसके जवाब में सरकार के पास बना बनाया तर्क है ही कि नोटबंदी से सिर्फ वही परेशान हुए जो बेईमान थे. इतना ही नहीं सरकार यह भी दावा कर रही है कि जो नोटबंदी के फैसले की मुखालफत करता है वह बेईमानों का तरफदार और खुद बेईमान है. इतने जबर्दस्त दावे का काट ढूंढना ही मुश्किल काम है. लेकिन सरकार का यह तर्क सुनते हुए मूक जनता नोटबंदी से बेईमानों के परेशान होने के सबूत जरूर देखना चाहेगी. बस यहीं दिक्कत है. क्योंकि एक बार यह एलान हो ही चुका है कि कुल पुराने नोटों में 99 फीसद यानी सारे पुराने नोट बदल ही गए. रही बात विपक्ष रूपी जनता की तो उनके नेता हरचंद कोशिश करेंगे कि जनता को याद दिलाया जाए कि खुद उनका क्या हाल हुआ है.

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