गोली और गाली के बाद अब गले लगाने की बात
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गोली और गाली के बाद अब गले लगाने की बात

Author: calender  08 Nov 2017

गोली और गाली के बाद अब गले लगाने की बात

जम्मू-कश्मीर पिछले डेढ़ सालों से बेहद अशांत है। बुरहान बानी की मौत के बाद से हिंसा का सिलसिला ऐसा चला कि सुरक्षाबलों की तमाम सख्ती के बावजूद उसे रोका नहींजा सका। उस पर सीमापार से आतंकियों की घुसपैठ, सैन्य बलों और सैन्य अड्डों पर हमले रोज की बात हो गई है। संघर्ष विराम का मजाक बनाते हुए सीमा पर गोलीबारी होती ही रहती है। देश की सुरक्षा में तैनात सिपाही शहीद हो रहे हैं और आम जनता भी इस अघोषित युद्ध में सुरक्षित नहींरह गई है। लोग अपने घरों को छोड़ने पर मजबूर हैं। शिक्षा, रोजगार, कारोबार सब चौपट हो रहे हैं। पीडीपी और भाजपा की गठबंधन वाली सरकार और केेंद्र की भाजपा सरकार कश्मीर की बिगड़ती स्थिति पर चिंता तो कई बार जतला चुकी थी, लेकिन हालात सुधारने के लिए कोई खास पहल नहींहो रही थी। हां, सख्ती दिखाने वाली मोदी सरकार में नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) ने पिछले कुछ अरसे में अलगाववादी नेताओं को टेरर फडिंग, हवाला आदि के नाम पर गिरफ्तार जरूर किया है। लेकिन इनकी गिरफ्तारियों से भी समाधान की कोई सूरत नजर नहींआई। अब प्रधानमंत्री मोदी गोली और गाली की जगह गले लगाने वाली अपनी घोषणा को शायद आजमाना चाहते हैं। इसलिए कश्मीर समस्या के हल के लिए भारत सरकार ने एक बार फिर वार्ताकार की नियुक्ति की है। आईबी के पूर्व प्रमुख, दिनेश्वर शर्मा को कश्मीर के लिए केेंद्र का विशेष प्रतिनिधि नियुक्त किया गया है। उन पर अब यह जिम्मेदारी होगी कि वे इस मसले से जुड़े सभी पक्षों से बातचीत कर समाधान की सूरत तलाशें। मोदी सरकार ने बातचीत की राह पर लौटने का जो फैसला लिया है, उससे एक बार फिर इस बात की पुष्टि होती है किकिसी भी उलझन को सुलझाने के लिए सिरे तलाशना ही समझदारी का काम होता है। यानी कोई भी समस्या बातचीत से ही सबसे अच्छे तरीके से हल की जा सकती है। डंडे या गोली जैसे उपाय लंबी दूर तक काम नहींआते हैं। काश, यह बात मोदी सरकार ने पहले समझी होती तो कश्मीर में इतने युवाओं का जीवन दांव पर नहींलगता। किसी को जीप के आगे बांध कर मानव कवच बनाने जैसा अमानवीय काम नहींहोता। बहरहाल, मोदी सरकार ने अब वार्ताकार की नियुक्ति की है, तो कुछेक सवालों का जवाब उसे ईमानदारी और निष्पक्षता से देना चाहिए। जैसे, इससे पहले भी एनडीए सरकार और यूपीए सरकार में कश्मीर में विभिन्न समूहों और नेताओं से बातचीत के लिए समितियां गठित की गई थीं। इन समितियों ने जो सुझाव, उपाय, सिफारिशें दी थीं, उन पर क्या नए वार्ताकार विचार करेंगे? दिनेश्वर शर्मा ने कहा है कि मैं घाटी में स्थायी शांति लाने में रुचि रखने वाले हर किसी से बात करना चाहूंगा। उनके इस कथन का क्या अर्थ निकाला जाए? क्या वे अलगाववादियों, हुर्रियत के नेताओं, पत्थरबाजी के आरोपी युवाओं सभी तबकों से बात करेंगे या इसकी कोई अलग चयनप्रक्रिया होगी? घाटी अशांत इसलिए हुई है कि एक पक्ष ने दूसरे पक्ष की दलीलें सुनने का धैर्य नहींरखा और न ही एक-दूसरे की दिक्कतों को समझने में दिलचस्पी दिखाई। यहां अविश्वास की एकगहरी खाई बन गई है, जिसे पाटे बिना शांति नहींलाई जा सकती। तो सवाल यह है कि दिनेश्वर शर्मा के एजेंडे में विश्वास की बहाली को कितनी प्राथमिकता दी गई है? और केेंद्र सरकार इस कार्य के लिए उन्हें किस हद तक छूट देगी? जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद ही नहींअब सांप्रदायिक तनाव भी एक गंभीर समस्या बन चुकी है। केेंद्र के विशेष प्रतिनिधि इसके लिए क्या कदम उठाएंगे? क्या कश्मीरी पंडितों की घर वापसी के बारे में वे कोई पहल करेंगे? और क्या इसमें कोशिश यह रहेगी कि जब भी ऐसा हो तो सारे पूर्वाग्रह, मनमुटाव खत्म हो जाएं। केेंद्र सरकार क्या कश्मीर के विभिन्न पक्षों से बिना किसी शर्त के बातचीत करेगी या शर्तों के साथ शांति प्रक्रिया प्रारंभ होगी? क्या पाकिस्तान के साथ भी बातचीत की प्रक्रिया को बढ़ाया जाएगा? क्योंकि कश्मीर समस्या के समाधान के बहुत सारे सूत्र वहां से निकलते हैं। सवाल कई हैं, जिनके जवाब के लिए इंतजार करना होगा। बस देखना यही है कि यह इंतजार कितना लंबा खिंचता है।

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