क्या राहुल कांग्रेस को नए भारत से जोड़ने की चुनौती के लिए तैयार हैं?
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क्या राहुल कांग्रेस को नए भारत से जोड़ने की चुनौती के लिए तैयार हैं?

Author:   08 Nov 2017

क्या राहुल कांग्रेस को नए भारत से जोड़ने की चुनौती के लिए तैयार हैं?

जब मौसम बदल रहा है तो कांग्रेस के कदमों में वसंत का उत्साह है, जो यह बताता है कि शायद राजनीतिक बियाबान में इसका लंबा और कठोर गर्मी का मौसम खत्म हो रहा है। आखिरकार राहुल गांधी पार्टी नेतृत्व की बागडोर संभालने वाले हैं। कांग्रेस की आक्रामक मीडिया रणनीति में गहमागहमी है। चुनाव की दहलीज पर खड़े गुजरात में नए भाजपा विरोधी गठजोड़ बन रहे हैं, नोटबंदी और जीएसटी नरेंद्र मोदी सरकार पर हमले करने के उपयोगी हथियार बन गए हैं। यशवंत सिन्हा जैसे वरिष्ठ भाजपा नेता के खुले विद्रोह ने विपक्ष को और गोला-बारूद दे दिया है। लेकिन, जैसा राजनीति में होता है, जो दिख रहा है वह संभव है जमीनी हकीकत से भिन्न हो। सच तो यह है कि जहां कांग्रेस दावा कर सकती है कि उसे वापसी की गंध रही है वहीं, वास्तविकता अब भी दिल्ली दूर अस्त का मामला है। आइए, कांग्रेस अध्यक्ष पद पर राहुल की काफी विलंब से हो रही नियुक्ति से शुरुआत करते हैं। उन्हें पार्टी उपाध्यक्ष बनाने और ‘सत्ता जहर है’ की चेतावनी मिलने को पांच साल हो गए हैं। जयपुर में उस भाषण से इस व्यापक धारणा की पुष्टि होती प्रतीत हुई कि राहुल अनिच्छुक राजनेता हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की भारी पराजय के बाद वे पृष्ठभूमि में चले गए, लोकसभा में विपक्ष का नेता बनने की चुनौती लेने से भी इनकार कर दिया। इससे वे दृढ़ता होने, जोखिम लेने वाले वंशवादी उत्तराधिकारी की छवि में ढल गए। साफ कहें तो मां-बेटे की दोहरी सत्ता का सिस्टम इतने लंबे समय तक चलाने की बजाय मई 2014 ही उनके लिए सूत्र संभालने का सही समय था। यह वह क्षण था जब सच्चे नेता से अपेक्षा होती कि वह दिखा देता कि उसमें कड़े संघर्ष का माद्दा है। संसद में सरकार को आड़े हाथों लेने की बजाय राहुल को ‘गैरहाजिर’ नेता का तमगा मिला, जो मुख्यधारा में डुबकी लगाने को तैयार नहीं था। अब कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनका आसन्न ‘चुनाव’ भी आदर्श स्थिति नहीं है। कांग्रेस की राज्य इकाइयों से आंख मूंदकर उनके नाम पर मोहर लगाने की हास्यास्पद कवायद की बजाय पार्टी को उनके सामने संभावित दावेदार को उतार देना था। सोनिया गांधी की क्षमता तब परखी गई जब शरद पवार, पीए संगमा और अन्य लोगों ने उनके विदेशी मूल पर सवाल उठाए। बाद में जितेंद्र प्रसाद ने उन्हें पार्टी अध्यक्ष के चुनाव में चुनौती दी। उन्होंने पार्टीजनों का सम्मान अर्जित किया, क्योंकि उन्होंने सारे आलोचकों से निपटने की तैयारी दिखाई। इसके विपरीत राहुल के लिए लाल कालीन बिछाया जा रहा है और कोई उन्हें चुनौती देने का इच्छुक नहीं है। जूनियर गांधी तो वैसे भी जीत जाते पर कड़े संघर्ष से मिली जीत से उन्हें उन कांग्रेस नेताओं का सम्मान मिल जाता जो निजी स्तर पर उन्हें देने को इच्छुक नहीं रहते और इससे हताश कार्यकर्ताओं में भी उत्साह भर जाता। इसकी बजाय राहुल को जो आसान राह दी गई है उससे सिर्फ स्वतंत्रता आंदोलन की इस पार्टी की चापलूसी, लोकतंत्र विरोध संस्कृति की पुष्टि होती है, एक ऐसी पार्टी जिसकी नाल एक ही परिवार से जुड़ी है। कांग्रेस कार्यसमिति सहित पार्टी के सारे ही पदों पर चुनावी मुकाबले से उस पार्टी संगठन को मजबूत बनाने में मदद मिलती, जो चुनाव की बजाय ‘मनोनयन’ की सर्वव्यापी हाईकमान संस्कृति से कमजोर ढीली हो गई है। यहां राहुल को पूरी तरह दोष नहीं दिया जा सकता। यह तो उनकी दादी, दुर्जेय इंदिरा गांधी की विरासत है, जिन्होंने सुनियोजित तरीके से कांग्रेस के क्षेत्रीय नेताओं का कद घटाया और पार्टी तंत्र को अपनी कद्दावर छवि का गुलाम बना दिया। राहुल को श्रेय देना होगा कि उन्होंने प्राय: सांगठनिक पुनर्गठन को अपना मुख्य लक्ष्य बताया है। लेकिन, वास्तविकता यह है कि वे और उनके सलाहकार पार्टी में नीचे से ऊपर की ओर जाने वाला सत्ता तंत्र निर्मित नहीं कर पाए। ऐसा तंत्र जो उन्हीं प्रतिष्ठा खो चुके चालबाजों और दरबारियों पर निर्भर रहने की बजाय नई प्रतिभाओं और ऊर्जाओं के लिए खुला हो। जब कोई रोगी आईसीयू में हो और लंबी खिंचती मौत का सामना कर रहा हो तो बैंड एड से काम नहीं बनेगा। कांग्रेस को बड़ी सर्जरी की जरूरत है, जिसे जिले और तहसीलों में स्थानीय इकाइयों में आमूल बदलाव से शुरू करना होगा। खेद है कि कांग्रेस ने हर स्तर पर जब गंभीरता से चुनाव कराए थे, उसे दो दशक से ज्यादा का समय हो गया है। ऐसे में क्या यह हैरानी की बात है कि कई महत्वाकांक्षी युवा राजनेता नए राजनीतिक संगठनों में चले गए जहां उन्हें बड़े अवसर मिल सकते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि कांग्रेस मोदी से आत्म-विनाश की अपेक्षा में इंतजार करें इसकी बजाय उसे कोई नया विचार लाना चाहिए। मजे की बात है कि मोदी की आर्थिक नीतियों की सिन्हा द्वारा आलोचना पर कांग्रेस खुश हो रही है जैसे भाजपा का अकेला वयोवृद्ध सिपाही मोदी के जगन्नाथी रथ को ठप कर सकता है। खुद को पुनर्जीवित करने की कांग्रेस की रेसिपी कहां है, जो ट्वीट और नारों से आगे जाती हो? यह सही है कि सोशल मीडिया अब मीडिया मशीन का महत्वपूर्ण अंग है लेकिन, सिर्फ फालोवर जोड़ने या लाइक्स तथा रीट्वीट बढ़ने से चुनाव जीते या हारे नहीं जाते। वॉट्सएप पर मोदी पर लतीफों की बढ़ती संख्या से प्रधानमंत्री के समर्थकों को चिंता होनी चाहिए, लेकिन तब भी चुनावी लड़ाई तो मैदानी सैनिकों को कड़ी धूप धूल के बीच इस विशाल देश के गली-मोहल्लों में ही लड़नी होगी। इसीलिए कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी का पहला काम ऐसा नेतृत्व देकर पार्टी में ऊर्जा भरना है, जो उस ‘नए भारत’ से पुन: जुड़ सके, जिसमें धीरज नहीं है और जो महत्वाकांक्षी है। एजेंडे को आकार देने, एक विज़न लोगों तक पहुंचाने, नए मतदाता वर्ग तक पहुंचने की सतत इच्छा और सबसे बड़ी बात हमेशा लड़ने की तैयारी होनी चाहिए। गुजरात जैसा नहीं कि एक बड़े चुनाव के कुछ माह पहले पार्टी जागती है और तत्काल नतीजे मिलने की उम्मीद पालने लगती है। मोदी के युग में राजनीति चौबीसों घंटे-सातों दिन का मामला है। क्या राहुल इस चुनौती के लिए तैयार हैं?

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