अर्थव्यवस्था के आंकड़ों में छिपा है सरकार का डर!
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अर्थव्यवस्था के आंकड़ों में छिपा है सरकार का डर!

Author: calender  08 Nov 2017

अर्थव्यवस्था के आंकड़ों में छिपा है सरकार का डर!

अर्थव्यवस्था पर अपने कामकाज का मजबूती से बचाव करते हुए, एनडीए सरकार ने आज एक तरह से मान लिया है कि अगला लोकसभा चुनाव सिर्फ राजनीतिक मुद्दों पर नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर आधारित होगा. फौरी तौर पर देखें तो सरकार के दिमाग पर गुजरात के चुनाव हावी है. ये तब साफ हुआ जब सरकार ने मंगलवार को अपनी तरह की खास प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई. इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने मंत्रालय के आला अफसरों के साथ मिलकर स्लाइड प्रेजेंटेशन के जरिए अर्थव्यवस्था से जुड़े कई आंकड़े पेश किए. एक बार फिर दोहराया गया कि भारत सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था है और जीएसटी जैसे बड़े सुधारों का छोटी अवधि में निगेटिव असर हो सकता है लेकिन लंबी अवधि में इसके कहीं बड़े फायदे होंगे. ये भी कहा गया कि सरकार अर्थव्यवस्था की चुनौतियों का जवाब उचित तरीके से देती रहेगी. लेकिन पूरी प्रेस कॉन्फ्रेंस की सबसे बड़ी हाईलाइट थी कैबिनेट के फैसले- सड़क निर्माण परियोजनाओं पर 7 लाख करोड़ रुपए का खर्च और सरकारी बैंकों के रिकैपिटलाइजेशन के लिए 2.11 लाख करोड़ रुपए की मदद. हालांकि सरकारी बैंकों की ये मदद पहले की घोषणाओं की ‘रिपैकेजिंग’ ही है. प्रेस कॉन्फ्रेंस में वित्त मंत्री मैक्रो-इकोनॉमिक आंकड़ों की व्याख्या करते दिखे. सड़क से लेकर रेलवे तक और बंदरगाहों से लेकर ग्रामीण सड़क योजना तक कई इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट का ब्यौरा दिया गया, सौभाग्य और उज्जवला स्कीम की खूबियां गिनाई गईं. इस दौरान जरूरत पड़ने पर वित्त मंत्रालय के सचिव हिंदी में भी जवाब देते नजर आए. जहां तक सड़क निर्माण परियोजनाओं का संबंध है, सरकार ने बताया कि अगले 5 सालों में देश में करीब 84,000 किलोमीटर सड़कें बनाई जाएंगी. इसमें हाइवे के लिए ‘भारतमाला’ परियोजना पर 5.35 लाख करोड़ का खर्च शामिल है. सरकार का दावा था कि भारतमाला परियोजना ने 14.2 करोड़ दिनों का रोजगार पैदा होगा. बैंकों में नई पूंजी डालने की योजना में ‘स्मार्टनेस’ दिखी, जब घोषणा की गई कि 2.11 लाख करोड़ में से बैंक 1.35 लाख करोड़ रुपए बॉन्ड के जरिए जुटाएंगे, बाकी 76,000 करोड़ रुपए बाजार और बजटीय सहायता से जुटेंगे. विशेषज्ञ कह सकते हैं कि ये सिर्फ ‘टेक्निकल रिकैपिटलाइजेशन’ है, ना कि बैंकों में वास्तविक पूंजी निवेश. वित्त मंत्री ने ये भी बताया कि रिकैपिटलाइजेशन बॉन्ड की बारीकियों पर काम चल रहा है और इनका ब्यौरा बाद में दिया जाएगा. जेटली ने अपने प्रेजेंटेशन को खत्म करते हुए कहा कि बैंकों को एमएसएमई सेक्टर को कर्ज देने को कहा जाएगा. यही सेक्टर सबसे ज्यादा मुश्किलों से जूझ रहा है और चुनावों के नजरिये से बीजेपी के लिए काफी अहम है. दरअसल, पूरे प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इसी बात पर जोर दिया गया कि कैसे सरकार के ये कदम रोजगार पैदा करेंगे, नई मांग बनाएंगे, बिजनेस का माहौल सुधारेंगे और आम आदमी (यानी वोटर) के लिए मददगार होंगे. वैसे, बैंक रिकैपिटलाइजेशन प्लान को छोड़कर, 100 मिनट से ज्यादा चली प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार की पुरानी योजनाओं और कदमों का ब्यौरा ही दोहराया गया. जो भी अनुमान जताए गए वो ‘उम्मीद’ पर आधारित हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि ये प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों बुलाई गई? शायद सरकार ने ये समझ लिया है कि जनता हमेशा वही बातें नहीं करेगी जो सरकार चाहती है. सरकार को ये गलतफहमी हो सकती है कि उसके जज्बाती कार्ड हमेशा चलते रहेंगे, लेकिन वो शायद ये भूल गई थी कि रुपये-पैसे से जुड़े जज्बात ज्यादा ताकतवर होते हैं. अगर आर्थिक सेहत में सुधार का अनुभव ना हो, अगर कमाई में गिरावट दिखे, अगर नौकरी जा रही हो तो इन चीजों की चुभन हर किसी को महसूस होती है. इसके लिए किसी वाद-विवाद या परिचर्चा की जरूरत नहीं है. राजनीतिक दल ये मानकर चलना चाहते हैं कि उनकी गढ़ी हुई कहानी या प्रोपेगंडा हमेशा काम करता है. लेकिन ऐसा है नहीं. इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक घबराहट दिखाई दी. तभी तो बार-बार ये संदेश देने की जरूरत महसूस हुई कि अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर सबकुछ बढ़िया है. साफ तौर पर, इतना ही पर्याप्त नहीं है. आने वाले वक्त में ये दिखना भी चाहिए कि अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने की सच्ची कोशिश रंग ला रही है.

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