उन्नाव रेप की पूरी कहानी किसी बड़े थ्रिलर फिल्म से भी ख़तरनाक है!
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उन्नाव रेप की पूरी कहानी किसी बड़े थ्रिलर फिल्म से भी ख़तरनाक है!

Author: Neeraj Jha calender  29 Jul 2019

उन्नाव रेप की पूरी कहानी किसी बड़े थ्रिलर फिल्म से भी ख़तरनाक है!

4 जून 2017-उन्नाव में एक लड़की का बलात्कार होता है। बलात्कार के आरोप उन्नाव के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर लगते हैं। पीड़िता पुलिस के पास जाती है। लेकिन नेता के रसूख़ के सामने पुलिस की कार्यवाही मंद पड़ जाती है।

असंतुष्ट होकर रेप पीड़िता 8 अप्रैल 2018 को सीएम आदित्यनाथ के घर के बाहर खुद को जला लेने की कोशिश करती है।   9 अप्रैल को न्यायिक हिरासत में पीड़िता के पिता की मौत हो जाती है। कुलदीप सेंगर के भाई पर आरोप लगता है कि उसने जुडिशियल कस्टडी में पीड़िता के पिता की पिटाई की जिससे उसकी मौत हो गई। विरोध बढ़ता है। विशेष जाँच दल गठित की जाती है। जाँच दल रिपोर्ट सौंपती है। रिपोर्ट में बताया जाता है कि स्थानीय पुलिस और डॉक्टर्स ने कई बड़ी लापरवाहियाँ की। 

मामला सीबीआई को सौंप दिया जाता है। CBI, कुलदीप सेंगर और उसके भाई के खिलाफ चार्जशीट दर्ज करती है। अगस्त 2018 में बलात्कार के की-विटनेस की मौत हो जाती है। बिना ऑटॉप्सी के उसकी लाश ज़मीन में गाड़ दी जाती है। 21 नवंबर 2018 को पीड़िता के चाचा को 18 साल पुरानी गन फायरिंग केस में अरेस्ट किया जाता है।

अब 28 जुलाई 2019 को पीड़िता के कार को एक ट्रक टक्कर मार देती है। दो परिजन मर जाते हैं। पीड़िता बुरी तरह से घायल हो जाती है। जिस ट्रक से एक्सीडेंट हुआ है, उसका नंबर प्लेट काले पेंट से लिपा हुआ है। अफसोस यह है कि ये कहानी बॉलीवुड के किसी थ्रिलर फिल्म की नहीं है। ये कहानी है उत्तर प्रदेश की एक लड़की की। जिसे नौकरी देने के नाम पर बलात्कार किया गया। और फिर लगभग पूरे परिवार पर शिकंजा कस लिया गया।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में सरकार बीजेपी की है और 403 में से 312 विधायक बीजेपी के हैं। कुल 143 विधायकों पर आपराधिक मुकदमें दर्ज़ हैं। इन 143 विधायकों में से 114 विधायक बीजेपी के हैं। मतलब बीजेपी के चुने हुए 37 प्रतिशत विधायक आपराधिक पृष्ठभूमि से हैं। वहीं अगर बात गंभीर आपराधिक मामलों की हो, तो कुल 107 विधायक और बीजेपी के 86 विधायक इस पृष्ठभूमि से संबंध रखते हैं। 

मतलब साफ है, उत्तर प्रदेश की विधानसभा में केवल नेता नहीं बल्कि नामी गुण्डे और अपराधी भी चुनकर जाते हैं। इसकी जिम्मेदारी जनता पर है। लेकिन जब जानकारियों का मुख्य स्तंभ मीडिया पक्षपाती हो जाए तो जनता कहाँ से जानकारियाँ हासिल करेगी? धनबल और बाहुबल के आगे बेबस लोगों को गोदी मीडिया और कमज़ोर कर रहा है।

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