मोदी की जीत - आशंकाओं और उम्मीदों के बीच झूलता लोकतंत्र!
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मोदी की जीत - आशंकाओं और उम्मीदों के बीच झूलता लोकतंत्र!

Author: Neeraj Jha calender  23 May 2019

मोदी की जीत - आशंकाओं और उम्मीदों के बीच झूलता लोकतंत्र!

मात्र 15 लोकसभा क्षेत्रों में लोगों से बातचीत के बाद जैसा माहौल लग रहा था - परिणाम बिल्कुल वैसे। आज चाय पीने नीचे गया तो फिर दो सिक्योरिटी गार्ड्स जो उत्तर प्रदेश से संबंध रखते थे, उनसे बातचीत हुई। उनकी भी वही राय जो 15 लोकसभा क्षेत्रों में लोगों की राय थी। राय है - "भैया किसी से कोई मतलब नहीं, हमें तो बस पीएम के तौर पर मोदी चाहिए।" मोदी की जीत हैरान करने वाली नहीं। ये जीत मोदी की जीत है। उनके मैनेजमेंट की जीत है। पत्रकारों के एक तबके द्वारा मोदी के पीआर में चौबीसों घण्टे जुटे रहने की जीत है। 

पिछले लोकसभा चुनावों में लोग कांग्रेस को हराना चाहते थे और इन चुनावों में मोदी को जितवाना चाहते थे। स्पष्ट हो मोदी लहर इस बार अधिक मजबूत थी। पिछले लोस चुनावों में जिसे मोदी लहर कहकर प्रचारित किया गया था, दरअसल वह एंटी कांग्रेस लहर थी। मोदी लहर के साथ नौकायन करते हुए मोदी की पार्टी के तमाम सांसद उम्मीदवार बेहतरीन प्रदर्शन करते दिखे।  लोगों को उम्मीदवारों से कोई मतलब था नहीं। लोग एक नायक का चुनाव करना चाहते थे। और वो नायक थे - नरेंद्र मोदी।

नायक से सम्मोहन के लिए कारण नहीं होते। बस सम्मोहन होता है। चाहे नायक की मौजूदगी में नौकरियाँ खत्म हो रही हों, किसान आंदोलन कर रहे हों, संस्थान खत्म हो रहे हों पर लोग नायक से नफरत नहीं कर सकते। नायक अगर आम खाने के तरीके की बात करे, या बादल-रडार विज्ञान बघारे या अपने बटुए के बारे में जानकारी दे - लोग हाथों हाथ लेते हैं। मोदी इसी तरह हाथों हाथ लिए गए। चुनावों का परिणाम दिखाता है कि मोदी और उनके प्रति सम्मोहन के अलावा तमाम नेता और तमाम मुद्दे अप्रासंगिक हो गए हैं। बिल्कुल वैसे ही, जैसे राजदरबार में राजा के अलावा सबकुछ अर्थहीन होता है।  

सारे घटकों का अर्थहीन हो जाना लोकतंत्र का अर्थहीन हो जाना है। हम लोगों (वोटर्स) ने एक ऐसी व्यवस्था के निर्माण की नींव डाली है जहाँ विपक्ष नहीं है। ऐसी व्यवस्था, जहाँ आलोचना नहीं है। ऐसी व्यवस्था, जिसमें एक व्यक्ति सरकार है और सरकार देश। इसलिए बहुत मुमकिन है कि ‘देशद्रोहियों’ की संख्या बढ़े। कलाकारों की कलात्मक आज़ादी पर बंदिशें बढ़ें। आलोचकों का अस्तित्व ख़तरे में पड़ जाए। पत्रकारिता का स्तंभ भरभरा का गिर जाए।

ये सब कपोल कल्पनाएँ नहीं हैं बल्कि एंटी कांग्रेस लहर पर सवार होकर सत्ता में आई बीजेपी के पाँच सालों के कार्यकाल पर आधारित विश्लेषण है। उम्मीद की जानी चाहिए कि ये संभावनाएँ ग़लत साबित हों। फिर से कोई गौरी लंकेश दोहराई न जाए। किसी जेएनयू को बिना कारण डिफेम न किया जाए। सरकार की आलोचना करने वालों को देशद्रोही न कह दिया जाए।थोक में पाकिस्तान का वीज़ा न बाँटा जाने लगे। 

उम्मीद की जानी चाहिए कि लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत की ओर अग्रसर भाजपा इस बार देश के सामाजिक प्रवृत्ति को समृद्ध करे। देशरूपी बागीचे के तमाम फूलों को खिलने के लिए समुचित स्थितियाँ प्रदान करे। नेहरु, राजीव और इंदिरा से आगे बढ़कर 2019 की बात करे। आलोचनाओं को जन्म लेने की जगह दे। और उन आलोचनाओं को प्रशंसा में बदलने के लिए काम करे। 

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