अर्थव्यवस्था का हाल बिगड़ा हुआ है, यह मानेंगे नहीं तो फिर इसे सुधारेंगे कैसे!
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अर्थव्यवस्था का हाल बिगड़ा हुआ है, यह मानेंगे नहीं तो फिर इसे सुधारेंगे कैसे!

Author: calender  09 Oct 2017

अर्थव्यवस्था का हाल बिगड़ा हुआ है, यह मानेंगे नहीं तो फिर इसे सुधारेंगे कैसे!

अर्थव्यवस्था में आ रही सुस्ती को लेकर पिछले काफी समय से केंद्र सरकार की आलोचना हो रही है. इस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो दिन पहले जवाब दिया है. एक कार्यक्रम में उनका कहना था कि इस साल अप्रैल से जून के बीच सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर घटकर 5.7 प्रतिशत रह जाना सिर्फ एक तिमाही की घटना है. प्रधानमंत्री की यह बात सही नहीं मानी जा सकती. यह गिरावट सिर्फ पिछली तिमाही में नहीं आई बल्कि जनवरी-मार्च (2016) से, यानी लगातार पांच तिमाहियों से जारी है. जबकि इस दौरान वैश्विक कारोबार में सुधार आता दिख रहा है और तमाम विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाएं भी मजबूत होने का संकेत दे रही हैं. इसके अलावा सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकॉनॉमी के आंकड़े बताते हैं कि जुलाई-सितंबर की तिमाही में नई निवेश परियोजनाओं के सिर्फ 84,500 करोड़ रुपये के प्रस्ताव मिले हैं जो 2014 की अप्रैल-जून की तिमाही के बाद सबसे कम आंकड़ा है. बुधवार को रिजर्व बैंक ने भी 2017-18 के लिए विकासदर के 7.3 प्रतिशत के अनुमान को घटाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया है. सीधे शब्दों में कहें तो अर्थव्यवस्था की हालत बिगड़ रही है और सरकार इसे अनदेखा नहीं कर सकती. मोदी सरकार को असलियत स्वीकार करनी चाहिए. इस समय अर्थव्यवस्था ढलान के आधे रास्ते पर है और जहां इसे टेक देना जरूरी हो गया है. इस दिशा में पहला कदम है कारोबारियों में भरोसा कायम करना जो गलत तरीके से जीएसटी लागू करने के चलते हिला हुआ है. इससे निर्माण क्षेत्र में एक अनिश्चितता छा गई है. इन हालात में अगर कोई आर्थिक मोर्चे पर सरकार की आलोचना कर रहा है तो उसे निराशा फैलाने वाला नहीं बताया जा सकता. बल्कि सरकार को यह स्वीकार करना चाहिए, आर्थिक सुस्ती की पहचान करनी चाहिए और फिर उस दिशा में सुधार के लिए कदम उठाने चाहिए. हालांकि प्रधानमंत्री ने संकेत दिए हैं कि सरकार के फैसलों से आर्थिक विकास पर अगर कहीं नकारात्मक असर पड़ा है तो वे ऐसे फैसलों को सुधारने के लिए प्रतिबद्ध हैं. पिछले दिनों पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने इंडियन एक्सप्रेस में एक आलेख लिखा था जिसमें उनका कहना था कि अब सरकार की छापामारी का दौर लौट आया है. इस लिहाज से प्रधानमंत्री मोदी की यह पहल भी स्वागतयोग्य है जिसके तहत उन्होंने कारोबारियों की चिंताओं पर उन्हें आश्वस्त करने की कोशिश की है और भरोसा दिया है कि सरकार उनके पुराने बही-खातों की जांच नहीं करेगी. उम्मीद की जानी चाहिए कि मोदी सरकार आने वाले दिनों में जीएसटी से शुरुआत करते हुए बैंकों के फंसे हुए कर्ज से निपटने सहित अपने कुछ नियम-फैसलों में जरूरी सुधार करेगी. आने वाले समय में अमेरिकन फेडरल रिजर्व और यूरोपियन सेंट्रल बैंक भी अपने बही-खाते सुधारने के लिए कुछ बड़े फैसले करेंगे और इसके चलते भारत से बड़ी मात्रा में मुद्रा निकाली जा सकती है. यह भी एक वजह है कि सरकार के लिए अगले कुछ महीने कड़ी परीक्षा जैसे साबित होने जा रहे हैं.

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