आडवाणी - इक पहाड़ जिसे कंकड़ की तरह फेंक दिया गया!
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आडवाणी - इक पहाड़ जिसे कंकड़ की तरह फेंक दिया गया!

Author: Neeraj Jha calender  22 Mar 2019

आडवाणी - इक पहाड़ जिसे कंकड़ की तरह फेंक दिया गया!

“मैं तो किसी सभा में ठीक से बोल भी नहीं पाता, मैं कैसे पार्टी का अध्यक्ष बनूँगा।” 
“लेकिन अब तो आप संसद में बोल लेते हैं। फिर ये संकोच कैसा?” 
“संसद में भाषण देना अलग बात है और हज़ारों की सभा के आगे बोलना अलग।”

ये बातचीत है भारत रत्न अटल बिहारी और लाल कृष्ण आडवाणी के बीच की। 1972 के चुनावों में हार के बाद अटल हार की नैतिक ज़िम्मेदारी ले चुके थे। वे चाहते थे कि आडवाणी जनसंघ के अध्यक्ष पद को संभालें। आडवाणी शायद मानसिक तौर पर तैयार नहीं थे और इसलिए भाषण कला का बहाना बनाकर इससे बचना चाहते थे। बात ग्वालियर की राजमाता सिंधिया से होते हुए तत्कालीन पार्टी उपाध्यक्ष भाई महावीर तक पहुँची। लेकिन दोनों की अंतिम मनाही के बाद आडवाणी को हाँ कहना पड़ा।

इसी बातचीत के दौरान अटल ने कहा था - देखो दीन दयाल उपाध्याय भी बहुत अच्छे वक्ता नहीं लेकिन लोग उन्हें उनकी गहन चिंतन की वजह से सुनते हैं। आडवाणी मान चुके थे और इस तरह जनसंघ में पहली बार अध्यक्ष बने।

1980 में बीजेपी बनी। 1984 में चुनावों में प्रदर्शन खराब रहा तो आडवाणी याद किए गए। अटल बिहारी की जगह पार्टी की कमान आडवाणी को सौंपी गई। और आडवाणी ने देश की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया। एक कभी न खत्म हो सकने वाला मुद्दा - राममंदिर। हिंदु वोटबैंक की स्थापना का श्रेय भी आडवाणी को जाता है।

आडवाणी का कद लगातार बढ़ रहा था। संगठन उनके समक्ष कभी-कभी बौना दिखने लगता था। गोधरा कांड के बाद जब मोदी का इस्तीफा सगभग तय था और अटल चाहते थे कि इस्तीफा हो जाए, वो आडवाणी ही थे जिन्होंने मोदी को बचाया। 
लेकिन ग़लती हो जाती है आडवाणी से। अटल के नंबर दो आडवाणी जिन्ना को सेकुलर बोल देते हैं। उनके द्वारा स्थापित हिंदु वोटबैंक की नाराज़गी उनकी पार्टी किसी भी कीमत पर मोल नहीं ले सकती थी। आडवाणी को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ता है।

और इसके बाद से आडवाणी अपनी ही कद के सामने बौने होने लगे। जिस मुद्दे की स्थापना आडवाणी ने की थी, उसका ध्वजवाहक कोई और हो गया। वो कौई और नरेंद्र मोदी थे जिनका राजनैतिक करियर अगर आज है तो आडवाणी की ही वज़ह से।

उन्हीं नरेंद्र मोदी ने आडवाणी को पहले मार्गदर्शक मंडल में डाला और अब उनके राजनैतिक करियर पर पूर्ण विराम लगा दिया। गाँधी नगर से 6 बार के लोकसभा सांसद आडवाणी को गाँधी नगर की टिकट नहीं मिली। आगे का सफर मुश्किल होगा।

आडवाणी को कैसे याद किया जाएगा। -

एक मुद्दे को जन्म जन्मांतरों के लिए राजनीति में स्थापित कर देने वाले राजनीतिज्ञ के रूप में?
एक लगभग खत्म हो चुके व्यक्ति को राजनीति में इस तरह बड़ा कर देने वाले चाणक्य के रूप में? या फिर 
एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो ताउम्र नंबर वन रहना चाहता था लेकिन अपने विरोधाभासों के कारण नंबर टू से उपर कभी नहीं रह सका।

आडवाणी के नंबर टू रह जाने का सबसे बड़ा कारण खुद आडवाणी हैं। वे खुद अपने आप को भी कभी नंबर वन नहीं मान सके। अगर मानते तो नरेंद्र मोदी की आँधी में उनकी ज़ुबान कट नहीं जाती। अगर, मानते तो लौह पुरुष के नाम से जाने जाने वाले आडवाणी अपने लबों को पथरा नहीं लेते। अगर मानते तो अपने द्वारा ही बनाए गए हिंदु वोटबैंक को किसी और के द्वारा संचालित नहीं होने देते। अगर मानते तो कभी जिनसे लोग टिकट मांगते थे, उनकी ही टिकट कट नहीं जाती।

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