बालाकोट हमले में क्या वाक़ई जैश के 300 आतंकवादी मारे गए थे?
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बालाकोट हमले में क्या वाक़ई जैश के 300 आतंकवादी मारे गए थे?

Satyahindi calender  03 Mar 2019

बालाकोट हमले में क्या वाक़ई जैश के 300 आतंकवादी मारे गए थे?

क्या भारतीय वायु सेना के हमले में जैश-ए-मुहम्मद के 300 आतंकवादी वाक़ई मारे गए थे? भारतीय वायु सेना के एअर वाइस मार्शल आर.जी.के.कपूर ने गुरुवार को दिल्ली में हुए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, 'हमें जो लक्ष्य दिया गया, वह हमने हासिल कर लिया, यह एक सफल मिशन था।'

इस मामले पर गहरा विवाद खड़ा हो गया है। अमेरिकी थिंकटैंक अटलांटिक काउंसिल से जुड़ी डिजिटल फोरेंसिक रिसर्च लैब और ऑस्ट्रेलिया की इंटरनेशनल साइबर पॉलिसी सेंटर ने सैटेलाइट तसवीरों के आधार पर दावे किए हैं कि बालाकोट में जाबा पहाड़ी पर बम तो गिराए गए हैं, पर उससे किसी तरह का कोई नुक़सान नहीं हुआ है।

प्रतिष्ठित समाचार एजेन्सी 'रॉयटर्स' और खाड़ी के चैनल 'अल जज़ीरा' के संवाददाताओं ने घटनास्थल तक जा कर जो देखा, उसके मुताबिक़ बालाकोट की जाबा पहाड़ी पर चार बम तो गिरे, लेकिन उन बमों से जानमाल का कोई नुक़सान नहीं हुआ। 'अल जज़ीरा' के संवाददाता का कहना है कि पहाड़ी पर बनी जिस इमारत को जैश का आतंकी शिविर बताया जाता है, वह वहाँ जस की तस खड़ी है और बम उससे काफ़ी दूर ख़ाली ज़मीन पर गिरे हैं। 

'रायटर्स' संवाददाता का कहना है कि जिस इमारत में मदरसा यानी जैश के आतंकी शिविर के चलने की बात कही जाती है, उसे या उसके आसपास कोई नुक़सान हुआ हो, ऐसा नहीं लगता।

लेकिन इन रिपोर्टो के उलट भारतीय वायु सेना और रक्षा विभााग से जुड़े दूसरे लोगों ने अपना यह दावा दुहराया है कि हमले में जैश को भारी नुकस़ान हुआ है। भारतीय रक्षा विभाग के सूत्रों का कहना है कि सिंथेटिक अपरचर रडार (एसएआर) की तसवीरों से साफ़ है कि हमले में बालाकोट का आतंकवादी शिविर नष्ट हो गया। 

सुरक्षा मामलों के अमेरिकी थिंक टैंक अटलाँटिक काउंसिल की डिजिटल फ़ॉरेन्सिक रिसर्च लैब (डीएफ़आर लैब) ने  सैटेलाइट इमेजरी के ज़रिये इसकी पड़ताल की कि बम कहाँ गिरे। डीएफ़आर लैब ने अपनी पड़ताल के बाद इस पर हैरानी जतायी कि बम जैश के आतंकी ठिकाने से इतनी दूर क्यों गिरे? उसने कहा कि यह वाक़ई बड़ा रहस्यमय है। कुल मिला कर इसमें कोई सन्देह नहीं है कि भारतीय वायुसेना ने बड़ी बहादुरी से जाबा पहाड़ी पर धावा बोला और बम गिराये, लेकिन वहाँ से लौटे विदेशी पत्रकारों और डीएफ़आर लैब सभी का कहना है कि बम असली लक्ष्य से काफ़ी दूर गिरे।  

क्या बम गिराया गया था?

डीएफ़आर लैब का कहना है कि मौक़े पर पड़े बमों के टुकड़ों से साफ़ पता चलता है कि भारतीय वायु सेना ने इज़रायल निर्मित स्पाइस-2000 प्रिसीज़न बम का इस्तेमाल किया। इस बम की ख़ूबी यह है कि इसे इस्तेमाल करने से पहले इसमें अक्षांश और देशांतर की सटीक जानकारी डाल दी जाती है। यह बम जीपीएस सिस्टम पर काम करता है और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल प्रणाली का इस्तेमाल करता है। यानी यह बम छोड़े जाने के बाद ठीक उसी अक्षांश और रेखांश पर पहुँचता है, जो इसकी प्रणाली में फीड किया गया हो। साथ ही जिस जगह को निशाना बनाना है, उस जगह की तसवीर भी इसमें पहले से फ़ीड कर दी जाती है और बम अपने निश्चित निशाने पर पहुँच कर इसमें फ़ीड की गयी तसवीर का मिलान निशाना बनाये जाने वाली जगह के वास्तविक दृश्य से करता है और दोनों का मिलान हो जाने पर निशाने पर वार करता है। 

स्पाइस-2000 प्रिसीज़न बम जिस इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल प्रणाली का इस्तेमाल करता है, वह इतनी सटीक है कि इसके निशाने में ज़्यादा से ज़्यादा 100 मीटर तक की चूक ही हो सकती है। तो फिर सवाल उठता है कि बम इतनी दूर जा कर कैसे गिरे?

डीएफ़आर लैब का कहना है शुरुआती रिपोर्टों में कहा गया था कि 1,000 किलोग्राम (यानी लगभग 2000 पाउंड) के बम गिराए गए। स्पाइस-2000 का भी बिल्कुल यही पेलोड होता है। बाद में आयी रिपोर्टों से इस बात की पुष्टि भी हो गयी कि स्पाइस-2000 का ही इस्तेमाल इस सर्जिकल स्ट्राइक में किया गया था।

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