लोकतंत्र किसे कहे - हैप्पी वैलेंटाइंस डे!
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लोकतंत्र किसे कहे - हैप्पी वैलेंटाइंस डे!

Author: Neeraj Jha   14 Feb 2019

लोकतंत्र किसे कहे - हैप्पी वैलेंटाइंस डे!

वैलेंटाइन्स डे है। आम लोगों के साथ-साथ, सियासत, सियासी दल, सियासी लोग सब अपने अपने प्यार के वश में उसे पाने के लिए सौ तिकड़म कर रहे हैं। इस हुजूम के बीच अगर कोई अकेला खड़ा है तो वो है लोकतंत्र।

दरअसल, लोकतंत्र की हालत भारत के अधिकतर सामान्य बुजुर्गों, बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं और कांग्रेस के कर्मठ लगे रहने वाले नेताओं जैसी हो गई है। एक को ज्यादा पूछा नहीं जाता, दूसरे को बोलने नहीं दिया जाता और तीसरे का हक एक परिवार विशेष में जन्म लेने वाली एक लड़की मार जाती है।

लोकतंत्र को भी ख़ामोश कर देने की तमाम कोशिशें की जा रही हैं, बल्कि होती रही हैं कहा जाए तो भी ग़लत नहीं होगा। वर्तमान की मोदी सरकार के साये में, प्रैस पर निगरानी रखकर चुन चुन कर आलोचकों से बदला लेते सोशल मीडिया वॉरियर्स हों या प्रियंका नहीं इंदिरा कहकर देश को पीछे ढ़केलने की कोशिशे करते कांग्रेस समर्थक, राजनैतिक निष्ठाओं को पूरा करने के लिए कलाकारों द्वारा इतिहासों से छेड़छाड़ कर बनाई जाने वाली फिल्में हों या फिर फोटोशॉप के माध्यम से लोगों का चरित्र हनन - सियासी ज़मीन में उगे लगभग सभी कुकरमुत्ते लोकतंत्र को बदसूरत कर रहे हैं।

अब कहिएगा साहब कि फिर ये लोकतंत्र बचाओ रैलियाँ क्या हैं? दरअसल इन रैलियों का उद्देश्य भी जुदा नहीं है। एक हैं शरद पवार। जब अन्ना का अनशन चल रहा था तब लोकपाल को पानी पीकर गरिया रहे थे। एक हैं अरविंद केजरीवाल जो अन्ना के अनशन के पोस्टर ब्वॉय थे, लेकिन आज लोकपाल को गरियाने वाले शरद पवार के गले में बाँहे डाले खड़े हैं।

एक हैं ममता बनर्जी, जो तमाम विपक्ष को एक मंच पर लाकर केंद्रीय सत्ता को कोसती तो हैं लेकिन अपनी तुष्टिकरण की नीति के कारण लोकतंत्र को जो नुकसान हो रहा है - उसके बारे में कभी कुछ बोलती नहीं। एक हैं राहुल गाँधी, जो लोकतंत्र की रक्षा के लिए खूब उछाले भरते हैं लेकिन अपनी पार्टी के अंदर लोकतंत्र को काले पानी की सज़ा देकर।

एक हैं लालू यादव, जो भ्रष्टाचार के पर्यायवाची के रूप में गिने जाते रहे हैं तो एक हैं नीतीश कुमार, जिनकी अंतर्रात्मा पार्टी के बदलने के साथ ही बदल जाती है। अच्छा, एक हैं नरेंद्र मोदी जी, जो मंचों पर जाते हैं तो शब्दों के बाणों से बींध देते हैं विपक्ष के तमाम नेताओं को लेकिन मुद्दों की बात आते ही नेहरु से आगे नहीं बढ़ पाते। अपने आप को प्रधानसेवक कहते हैं लेकिन सेवा करते हुए क्या किया है - ये नहीं बताते।

एख हैं देश की संस्थाएँ, जो निर्जीव हुई जान पड़ती हैं। कब, कौन उनकी लगाम खींचने लगता है - पता ही नहीं चलता।सरकार चाहे कोई भी हो लोकतांत्रिक संस्थाएँ सरकारों के शरण में पड़ी दिखती हैं।

ऐसे में लोकतंत्र को बचाने वाली रैलियाँ उस भाई की खीझ है जिसने माँ-बाप पर कभी ध्यान दिया नहीं पर दूसरा भाई जब ताकत के बल पर पुस्तैनी ज़मीन हथिया रहा है तो माँ बाप की आड़ में उस ज़मीन पर आँख गड़ाए बैठा है। कुल मिलाकर पिस माँ रही है। दोनों में से किसी को माँ-बाप की फिक्र नहीं बल्कि माँ-बाप से हासिल होने वाली कुर्सियों की फिक्र है। 

संविधान बचाने, लोकतंत्र बचाने और लोकतांत्रिक संस्थाओं को बचाने के स्वर वही लोग आलापते हैं जो विपक्ष में होते हैं फिर चाहे वो बीजेपी हो या कांग्रेस, अखिलेश हों या शरद पवार। काश, सत्ता में आने के बाद भी ख्याल रखें, तो लोकतंत्र भी कह सकेगा हैप्पी वैलेंटाइंस डे।

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