संविधान पर हंटर चलाना है सत्ता का स्वभाव
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संविधान पर हंटर चलाना है सत्ता का स्वभाव

Author: Nilanjay Tiwari calender  13 Feb 2019

संविधान पर हंटर चलाना है सत्ता का स्वभाव

"अभिव्यक्ति की आज़ादी" सड़क पर रहते हैं तो कहते हैं "कुचला जा रहा है"
कुर्सी मिलते ही खुद "अभिव्यक्ति" शब्द को खत्म करने की साजिश करने लगते हैं. ये किसी एक पार्टी और नेता की गाथा नहीं सबकी यही कहानी है. लोकतंत्र, संविधान जब तक दूसरे के हाथ में है तब तक खतरे में और असुरक्षित है और खुद के हाथ में आते ही उसके चीथड़े करने में वो खुद कोई कसर नहीं छोड़ते. वर्षों से सत्ता ऐसे ही कुकर्म करती रही है फिर वो कांग्रेस हो, अखिलेश हों, योगी हों या बंगाल की दीदी हो.  

बीते दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम के आयोजन में अखिलेश यादव को बतौर मुख्य अतिथि निमंत्रण दिया गया. अखिलेश यादव को चौधरी चरण सिंह हवाई अड्डे पे रोक दिया जाता है, वहीँ धर्मेंद्र यादव पर लाठी बरसाई जाती है. खबरों से सब कुछ गायब होकर यह एक नया मुद्दा बन जाता है और सबके अपने अपने तर्क आने लगते हैं.
जिस ममता बनर्जी ने योगी का हेलिपकटर लैंड नहीं होने पर यह कहा था की "पता नहीं क्यों डीएम ने लैंड नहीं होने दिया" आज वो अखिलेश यादव का समर्थन करते हुए भाजपा को खरी खोटी सुना रही हैं. जो अखिलेश आज योगी को गरिया रहे हैं उन्होंने 20 नवम्बर 2015 को योगी को इलाहबाद घुसने तक की पाबंदी लगा दी थी जब वो एबीवीपी के कार्यक्रम में आ रहे थे, यही नहीं कैंपस छावनी में तब्दील हो गयी थी और शहर में धरा 144 तक लगा दिया था. तब यही वो योगी थे जो अखिलेश को तानाशाह बता रहे थे और आज शब्द वहीँ हैं बस चरित्र और चरित्रों के नाम में फेर बदल हुआ है.
ये रही 12 जनवरी की बात, 11 जनवरी को जिग्नेश मेवानी को एचके कॉलेज में मुख्य अतिथि बनाया जाता है और इसकी भनक लगते ही कॉलेज ट्रस्टी समारोह रद्द कर देते हैं. कॉलेज के प्रिंसिपल और वाइस प्रिंसिपल नाराजगी जताते हुए इस्तीफा दे देते हैं और साफ़ तौर पर कहते हैं की "एक राजनीतिक पार्टी के छात्र नेताओं की धमकियों के कारण ऐसा किया गया"

तो क्या अब यह माना जाए "जिसकी सरकार वो कुछ भी करेगा"
या ये माना जाए कुर्सी मिलते ही तेवर बदल जाते हैं और आप खुद वही करने लगते हैं जिसको आप कभी तानाशाही मानते थे ?
यह दोहरी राजनीति ही तो है जो हमे "विश्व गुरु" बना रही है, वरना हमने तो 2 जून की रोटी और रहने को छत के अलावा कहाँ कुछ सोचा. खैर जिस तरह से ये नेता राजनीति  हमें कुछ दिलाने के चक्कर में हमसे बचा कूचा भी चीन रही है उससे हम एक दिन सर्वशक्तिमान, विश्व गुरु के बाद कुछ और भी बन सकते हैं.

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