जेटली साहब सुनिए, यंग इंडिया अधिकार मार्च में बेरोज़गारी और बेरोज़गारों की गूँज
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जेटली साहब सुनिए, यंग इंडिया अधिकार मार्च में बेरोज़गारी और बेरोज़गारों की गूँज

Author: Neeraj Jha   07 Feb 2019

जेटली साहब सुनिए, यंग इंडिया अधिकार मार्च में बेरोज़गारी और बेरोज़गारों की गूँज

तमिलनाडु सचिवालय में स्वीपर के पद के लिए 14 रिक्तियाँ निकलती हैं और 4600 आवेदन पहुँच जाते हैं। आवेदन करने वालों में एमबीए से लेकर इंजीनियरिंग तक के छात्र शामिल हैं। घटनाएँ आम हो चुकी हैं सो ज्यादा चर्चा नहीं होती।

देश में बेरोज़गारी 45 सालों के अपने सर्वोच्च पर पहुँच चुका है। लेबर फोर्स लगातार सिकुड़ रहा है। NSSO की सर्वे के मुताबिक 15-29 साल के युवाओं के लेबर फोर्स में 2017-18 में 2011-12 के मुकाबले 6 फीसदी से अधिक गिरावट है।

SSC जैसी सरकारी परीक्षाओं को नियमित और प्रॉपर तरीके से संचालित करना टेढ़ी खीर साबित हुआ है। कोई भी सरकारी परीक्षा अपने नियमित सीमा में पूर्ण नहीं हो पाता। पेपर लीक, नकल केसेज़, कोर्ट के चक्कर, टेक्निकल ग्लिच आदि लगभग हर परीक्षा में युवाओं के भविष्य पर शनि बनकर बैठे दिखते हैं।

जब भी बेरोज़गारी का सवाल उठता है तो सरकार आँकड़े न होने का हवाला देती है। उबर और ओला के उदाहरण से युवाओं के ज़ख्मों पर नमक कुरेदने की कोशिश करती है। लेकिन इन सबके बीच आँकड़े बताने वाली संस्था के कार्यवाहक प्रमुख इस्तीफा दे देते हैं यह कहते हुए कि सरकार आँकड़े सार्वजनिक नहीं कर रही। 

अरुण जेटली एक ट्वीट करते हैं कि अगर देश में बेरोज़गारी इस हद तक है तो आखिर क्यों नहीं एक भी बड़ा छात्र आँदोलन देखने को मिलता है? 

जेटली साहब, क्या यही नीयति है भारत के युवाओं की। पहले पढ़ाई करें। रिक्तियों का इंतज़ार करें। परीक्षा दें। परीक्षा के कैंसल होने का इंतज़ार करें। फिर से परीक्षा दें और फिर परिणाम और नियुक्ति के लिए आंदोलन? 

अगर आंदोलनों का शोर ही सुनना चाहते हैं तो कानों में पड़ी अहंकार की रुई और आँखों पे पड़ा कुर्सी का चश्मा उतारिए। सुनिए, उन सपनों की चीखें, जो व्यवस्था की विकलांगता के कारण इंतज़ार करते हुए दम तोड़ रही हैं। देखिए, दिल्ली के जीटीबी नगर और मुखर्जी नगर में ग्रुप डी की परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए कोचिंग संस्थानों और उन संस्थानों में ऊँची डिग्रियाँ हासिल किए हुए युवाओं की भीड़।

सामने आने दीजिए वे आँकड़े जो चीख चीख कर कह रहे हैं कि सरकारों ने अपनी योजनाओं से युवाओं को बिल्कुल उसी तरह फेंक दिया है जैसे चाय में पड़ी मक्खी को फेंका जाता है।

वे आँकड़ें जो बता रहे हैं कि आधी से अधिक वर्किंग एज पॉप्युलेशन लेबर फोर्स में शामिल नहीं है।

जेटली साहब, यंग इंडिया अधिकार मार्च के जरिए बेरो़गारी और बेरोज़गारों की गूँज सुनाने के लिए युवा लाल किला से जंतर मंतर तक मार्च करेंगे। बुलेट ट्रेन और राफेल के शोरगुल के बीच अगर संभव हो तो ये गूँज सुनिए।

देश की शिक्षा व्यवस्था और रोज़गार के अवसरों को लेकर जो मतिभ्रम है वो दूर हो जाएगा। 

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