बंगाल की दीदी और बीजेपी के दादाओं के बीच पिसता लोकतंत्र
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बंगाल की दीदी और बीजेपी के दादाओं के बीच पिसता लोकतंत्र

Author: Neeraj Jha   04 Feb 2019

बंगाल की दीदी और बीजेपी के दादाओं के बीच पिसता लोकतंत्र

बंगाल की दीदी और बीजेपी के दादाओं की ये लड़ाई लोकतंत्र की ताबूत में एक कील है। घोटालों की जाँच कर रही सीबीआई के साथ ममता बनर्जी की पुलिस ने जो किया, वो ग़लत है। CBI और Police के बीच की ये जंग लोकतांत्रिक ह्रास का एक उदाहरण है।

ऐसा लग रहा था मानो किसी बॉलीवुड फिल्म के दो बड़े गुण्डे अपने अपने गुर्गे भेजकर वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हों। ममता ने बंगाल को अपनी पैतृक संपत्ति समझ रखा है तो मोदी सरकार ने संवैधानिक संस्थाओं को अपनी जागीर।

ख़ैर, हिंसा और तुष्टिकरण को ममता भी अपने मूल राजनैतिक हथियार के तौर पर प्रयोग करती रही हैं और बीजेपी की पूरी की पूरी राजनीति इन्हीं पर आश्रित है।

ममता, प. बंगाल में विपक्षी नेताओं को एक मंच पर लाती हैं, विपक्षी नेता ममता की तारीफ करते हैं और दबे-छिपे शब्दों में पीएम पद के लिए उपयुक्त बताते हैं, योगी आदित्यनाथ की रैली को मंजूरी नहीं मिलती, सीबीआई पुलिस कमिश्नर के घर धावा बोल देती है, पुलिस सीबीआई के अपसरों को डिटेन करती है, ट्विटर पर ट्रेंड चलता है - West Bengal Needs President's Rule - और यह ट्रेंड एक छिपी हुई मंशा की तरफ इशारा करता है।

2014 में सीबीआई को आदेशित किया गया इस मामले की जाँच के लिए और सीबीआई 2019 चुनावों से पहले जैकी चैन जैसी फुर्ती दिखाने की कोशिश कर रही है - ये सब केवल एक इत्तेफाक नहीं।

इस सबके दौरान कभी ममता के विपक्ष में खड़े राहुल के पुराने ट्वीट सामने आ रहे हैं तो कभी CBI को बुरा भला कहते मोदी साहब के। मोदी या राहुल के पुराने ट्वीट और कुछ नहीं बल्कि राजनैतिक चरित्र दिखाते हैं। इस राजनैतिक चरित्र में कुछ सही और कुछ ग़लत नहीं होता। जो होता है वह है मौक़ा। और मौके को भुनाने की कामयाबी ही राजनेता की कामयाबी होती है। 

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