राम का नाम या ज़मीन पर काम, फैसला आपका !!
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राम का नाम या ज़मीन पर काम, फैसला आपका !!

Author: Nilanjay Tiwari calender  11 Jan 2019

 राम का नाम या ज़मीन पर काम, फैसला आपका !!

फिर से एक बार "राम मंदिर" बनने को तैयार है, सवर्णों को उनका "हक़" उनका आरक्षण मिल गया, किसानों की कर्ज माफ़ी हो गयी, अब नौकरियां भी निकलेंगी और जगहें भी बनेगी. भले ही हर जगह नहीं लेकिन वो सड़कें चमक जाएंगी जहाँ से नेता जी को गुजरना होगा, अब आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ये तो सबको पता है. लोकसभा चुनाव नजदीक है साहब

 

देश की सियासत बीटेक और नेता बीटेक के छात्रों की तरह हो गए हैं. चुनाव उनके लिए एग्जाम है और चुनाव नजदीक आते ही चीटूर पिटूर काम ठीक वैसा ही है जैसे छात्र छात्राएं परीक्षा के एक आधी रात पहले तैयारी करते हैं. इससे ना उनका भला होता है ना ही देश का भला हो रहा है. नेता वही ढर्रा कई सालों से अपनाते आ रहे हैं और हम भी उन्ही के साथ कदम ताल करते रहे हैं. फिर कैमरा माइक देख उछलने लगते हैं की काम नहीं हुआ, नाली नहीं बनी, साफ़ पानी तो दूर समय से पानी आजाए वो बड़ी बात है, राशन सरकारी कोटा के बजाए मिश्रा जनरल स्टोर से लेना पड़ता है. हमें आँखें खोलने की जरूरत है वरना इस लोकतंत्र और देश को सफ़ेद चोले वाले भूत खा जाएंगे. जब हम जागेंगे तो सामने दूर दूर तक रेगिस्तान होगा और हालत, इराक वाले नजर आ रहे होंगे.

इसलिए पहचानिए कौन क्षेत्र में रहता है, कौन मौकापरस्त नहीं है, कौन जात की राजनीति करता है और कौन आपके हक को दबाने, कुचलने और छीनने में लगा हुआ है. देश में महागठबंधन से लेकर यूपीए व एनडीए  से जुड़े तमाम दल मुद्दाविहीन हैं| ये, सिर्फ जात पात की राजनीति से अपना अस्तित्व बरकरार रखे हुए हैं और हम इनका साथ पूरा दे रहे हैं. देखा जाए तो इन तमाम दलों का कोई एजेंडा नहीं है, सिर्फ मकसद है और वो मकसद दिल्ली दरबार तक पहुंचने पर ख़तम हो जाता है.

 

फिर वो

अनुप्रिया पटेल (अपना दल)

उपेंद्र कुशवाहा (राष्ट्रीय लोक समता पार्टी)

रामविलास पासवान (लोक जनशक्ति पार्टी)

ओम प्रकाश राजभर ( सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी) आदि

की ही बात क्यों ना कर लिया जाए. चुनाव आते ही ये गठबंधन से लेकर ठगबंधन के चक्कर में लग जाते हैं. ना कोई मुद्दा, ना कोई विकास कार्य की योजना और ना ही कोई नीति. नाम भर के लिए सिर्फ एक गुलाबी या पीला पर्चा दिख जाती है जिसमे कुछ अक्षरों में "घोषणापत्र" लिखा होता है. चुनाव के बाद हिसाब के तौर पर बस इतना याद रहता है की "घोषणापत्र" छपाई में कितना खर्चा हुआ. इसलिए आने वाले लोकसभा चुनावों में सजग रहिए कभी आपको राम मंदिर, कभी गाय, कभी जात के आधार पर बाँटा जाएगा और इन्हीं को मुद्दा बनाकर आपको फिर से छलने की कोशिश की जाएगी. अब फैसला आपका होगा की आप अपना प्रतिनिधी किस आधार पर चुनेंगे क्योंकि अंत में बिदबिदाते कीचड़ में आप ही को चलना होगा, पसीने में लतपत आप ही को रहना होगा और पानी के लिए आप ही को तरसना होगा.

फैसला आपका की आप बिकना चाहते हैं या आगे बढ़ना चाहते हैं. आपका भविष्य आपके हाथ.

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महाराष्ट्र में अगर शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के गठबंधन की सरकार बनती है तो क्या उसका हाल भी कर्नाटक जैसा होगा ?

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