अगर 'मोदी आरक्षण' लिया, तो क्यों काफ़ी घाटे में रहेंगे सवर्ण?
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अगर 'मोदी आरक्षण' लिया, तो क्यों काफ़ी घाटे में रहेंगे सवर्ण?

Satya Hindi   09 Jan 2019

अगर 'मोदी आरक्षण' लिया, तो क्यों काफ़ी घाटे में रहेंगे सवर्ण?

मोदी सरकार के 'ग़रीब सवर्ण' आरक्षण पर चर्चा गरम है। मंगलवार को लोकसभा में इससे जुड़ा बिल पास हो गया। पर सवाल यह है कि क्या इसका फ़ायदा उनको मिलेगा जिनको ध्यान में रख कर यह किया गया है या करने की बात की गई है! क्या वाक़ई 'ग़रीब' सवर्ण इस फ़ैसले का लाभ उठा पाएगा? मेरा अपना मानना है कि इससे ग़रीब सवर्णों को कोई फ़ायदा नहीं होगा। उलटे उनके मौक़े पहले से 20% रह गए हैं! आप सुन कर हैरान हो गए होंगे! इस वक़्त सरकार के फ़ैसले से सवर्णों को लग रहा है कि उनकी तो लॉटरी निकल गई है क्योंकि उनको अब आसानी से नौकरी मिल जाएगी। आरक्षण उनके लिए नये अवसर के दरवाज़े खोलेगा। किसी ख़ुशफ़हमी में नहीं रहिएगा। ऐसा कुछ नहीं होगा। पहले ग़रीब सवर्ण भी जनरल कैटिगरी में आवेदन करते थे, जिसमें कुल सीटों की 50 फ़ीसदी से ज़्यादा सीटें आती थीं। लेकिन नयी आरक्षण व्यवस्था में तो केवल 10% सीटें उनके हिस्से में रखी गई हैं।

अगर वह इसकी माँग करेगा तो फिर उसे 10 फ़ीसदी कोटे में ही नौकरी पानी होगी।

सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बहुत साफ़ है। दीपा ई. वी. ने ओबीसी कैटिगरी के तहत आवेदन दिया था। चूँकि जनरल कैटिगरी में परीक्षा के 'मिनिमम कट ऑफ़ पॉइंट' पर कोई उम्मीदवार पास नहीं हुआ तो दीपा ने यह अपील की कि उन्हें जनरल कैटिगरी के तहत नौकरी के लिए योग्य माना जाए। सरकार ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। दीपा ने हाई कोर्ट में इस फ़ैसले को चुनौती दी। हाई कोर्ट ने उनकी अपील ख़ारिज कर दी। दीपा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की बात मानी और दीपा की दलील ख़ारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'अपीलकर्ता ने ओबीसी कैटिगरी के तहत उम्र में रियायत ली, और इंटरव्यू भी ओबीसी कैटिगरी में ही दिया, इसलिए उसे जनरल कैटिगरी में नौकरी नहीं मिल सकती।' आरक्षण का अर्थ ही होता है कि जो कमज़ोर है, उनके लिए विशेष रियायत दी जाए ताकि वह प्रतिस्पर्धा के लायक़ बने। आरक्षण उन्हें ही दिया जाता है जो किन्हीं कारणों से कमज़ोर हैं, पिछड़ गए हैं और जो इस कारण जनरल कैटिगरी में कंपीट नहीं कर सकते। और इसीलिए वे कभी भी समाज की मुख्यधारा में नहीं आ पाएँगे। नौकरियाँ हो या शिक्षण संस्थान, उनको जगह नहीं मिल पाएगी और वे पिछड़े ही बने रह जाएँगे। 

क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट का आदेश?

एससी/एसटी और ओबीसी कैटिगरी में आने वालों को प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के समय उम्र, लिखित परीक्षा में अवसर की संख्या और अनुभव के मामले में रियायत दी जाती है। इनके लिए परीक्षाओं का 'कट ऑफ़ पॉइंट' भी जनरल कैटिगरी से कम होता है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा, 'एससी/ एसटी और ओबीसी कैटिगरी से रियायत लेने के बाद ऐसे उम्मीदवारों के लिए जनरल कैटिगरी का फ़ायदा लेने के लिए साफ़ सीमा तय की गई है।' डिपार्टमेंट ऑफ़ परसनेल और ट्रेनिंग का नियम भी स्पष्ट है कि 'जब एससी/ एसटी और ओबीसी कैटिगरी के उम्मीदवारों के लिए रियायत दी जाती है, उम्र की सीमा, अनुभव, योग्यता और लिखित परीक्षा में अवसरों की संख्या में जनरल कैटिगरी की तुलना में ज़्यादा रियायत दी जाती है, ऐसे में ऐसे उम्मीदवार जनरल कैटिगरी के लिए अयोग्य माने जाएँगे।'

गुजरात हाई कोर्ट का भी एक फ़ैसला

इसी तरह 2015 में गुजरात हाई कोर्ट का भी एक फ़ैसला है। नीलेश राजेंद्रकुमार के मामले में हाई कोर्ट ने कहा, 'अगर आरक्षण के तहत उम्मीदवारों ने रियायत ली है तो उन्हें फिर जनरल कैटिगरी में रिक्त स्थान के लिए उपयुक्त नहीं माना जाएगा। वे आरक्षित कैटिगरी में ही फ़ायदा ले पाएँगे।” इन दोनों फ़ैसलों से साफ़ है कि अब जो सवर्ण मोदी सरकार के फ़ैसले के बाद आर्थिक आधार पर आरक्षण का लाभ लेंगे, वे फिर बाक़ी बचे 40 फ़ीसदी के जनरल कैटिगरी कोटे के लिए अयोग्य हो जाएँगे। 

मोदी सरकार ने आरक्षण के लिए 'ग़रीबी' नापने के तीन मानदंड बनाए हैं। 

  1. वे परिवार जिनकी सालाना आमदनी 8 लाख रुपये से कम है।
  2. ऐसे परिवार जिनके पास 5 एकड़ से कम ज़मीन है।
  3. ऐसे परिवार जो 1000 वर्ग फ़ुट से कम के मकान के मालिक हैं।
  • इस कैटिगरी में आने वाले परिवार ग़रीबी के आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण के योग्य होंगे। यह फ़ैसला ऊपर से देखने में काफ़ी आकर्षक लगता है, पर हक़ीक़त में मोदी सरकार के फ़ैसले से जो ग़रीब सवर्ण खुश हो रहा है, यह उसके लिए बड़े घाटे का सौदा है।

कितनी जनसंख्या आएगी दायरे में?

'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' में छपी एक ख़बर के मुताबिक़ देश में ऐसे 95% परिवार हैं जो 8 लाख रुपये प्रति वर्ष से कम कमाते हैं। इसी तरह कृषि जनगणना 2016-17 के हिसाब से देश में 5 एकड़ से कम ज़मीन रखने वालों का आँकड़ा 86.6% है जबकि 1000 वर्ग फ़ुट से कम के मकान के मालिकों का आँकड़ा तक़रीबन 90% है। यानी आबादी का 90% से ज़्यादा हिस्सा इन पैमानों पर ‘गरीब’ हो जाता है। यह फ़ॉर्मूला ग़रीब सवर्ण पर भी कमोबेश लागू  होता है। यानी आरक्षण देने के लिए जो योग्यता सरकार ने निर्धारित की है, उसके हिसाब से एससी/एसटी/ओबीसी को मिले आरक्षण के बाद बची जनरल कैटिगरी की आबादी के कम से कम 85% लोग ग़रीब सवर्ण आरक्षण के पात्र होंगे। यानी जो भी सवर्ण 'ग़रीब' 10 फ़ीसदी आरक्षण के लिए आवेदन करेगा, वह पहले की तरह जनरल कैटिगरी के लिए बाक़ी बचे 41 फ़ीसदी कोटे के लिए अयोग्य हो जाएगा। 

  • यानी 'ग़रीब' सवर्ण जो पहले जनरल कैटिगरी की 51 फ़ीसदी सीटों के लिए कंपीट करता था, अगर वह आरक्षण का लाभ लेना चाहेगा तो सिर्फ़ 10 फ़ीसदी के लिए ही कंपीट कर पाएगा जबकि सामान्य कैटिगरी के बाक़ी बचे 15% 'अमीर' सवर्ण 41 फ़ीसदी के जनरल कोटे के लिए कंपीट करेंगे। यानी अमीर सवर्ण का काम अब पहले से ज़्यादा आसान हो जाएगा।

इस आरक्षण के बाद 'ग़रीब' सवर्णों की आरक्षित कैटिगरी में मेरिट लिस्ट काफ़ी ऊँची होगी क्योंकि 10% सीटों के लिए अब 85% लोग कंपीट करेंगे। इसके उलट बाक़ी बची 41% सीटों के लिए मेरिट लिस्ट बहुत कम होगी क्योंकि जनरल कैटिगरी में आनेवाले 15% फ़ीसदी लोग सामान्य कोटे में गिनी जाने वाली 41% सीटों के लिये कंपीट करेंगे।

अब आप ही बताएँ कि कौन मज़े में रहा, अमीर सवर्ण या 'ग़रीब' सवर्ण? अब आप तय करें कि मोदी सरकार ने ग़रीब सवर्णों को फ़ायदा पहुँचाया या अमीर सवर्णों को? ग़रीब के लिए पहले भी नौकरियाँ नहीं थीं, अब वह जो भी थीं, उनसे भी बाहर हो गया। क्या यह दिनदहाड़े डकैती है कि नहीं?

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