राफेल के चिराग से निकला ऑडियो जिन्न!
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राफेल के चिराग से निकला ऑडियो जिन्न!

Author: Neeraj Jha   02 Jan 2019

राफेल के चिराग से निकला ऑडियो जिन्न!

राफेल डील के रहस्यमयी चिराग से एक और जिन्न बाहर आया है। ये जिन्न है गोआ के बीजेपी मंत्री विश्वजीत राणे का ऑडियो। कांग्रेस ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर आज सुबह एक ऑडियो पोस्ट किया। ऑडियो मनोहर कैबिनेट के मंत्री विश्वजीत राणे का है। ऑडियो में विश्वजीत ने दावा किया कि पूर्व रक्षामंत्री मनोहर पार्रिकर ने Cabinet Meeting के दौरान कहा कि राफेल से जुड़ी एक-एक फाइल और जानकारी उनके बेडरूम में पड़ी हैं।

कांग्रेस ने बीजेपी पर एक बार फिर से हमला शुरू कर दिया। कांग्रेस ने कहा कि पारिकर जिन फाइलों का ज़िक्र कर रहे हैं उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। आखिर कौन सा राज छिपा है इन फाइलों में - यह देश के सामने आना चाहिए।

राफेल की कहानी है क्या - 

2007 में वायु सेना ने 126 जेट की रिक्वायरमेंट दर्ज करवाई। तत्कालीन यूपीए सरकार ने आवश्यकतानुसार 126 जेट खरीदने के लिए सभी संभावित एयरक्राफ्ट्स को जाँचने-परखने के बाद डसॉल्ट के राफेल का चुनाव किया। इन 126 एयरक्राफ्ट में से 18 एयरक्राफ्ट डसॉल्ट उड़ान के लिए तैयार की स्थिति में देती जबकि 108 जेट का निर्माण तकनीक हस्तांतरण के जरिए एचएएल करता। जिसके विमानों ने 1965 के युद्ध में अमेरिका द्वारा निर्मित विमानों को पछाड़ दिया था।

2014 में डसॉल्ट के सीईओ और एचएल के चेयरमैन ने एक प्रेस कांफ्रेंस की। इसमें डसॉल्ट के सीईओ ने कहा कि एचएएल के साथ डील का 95 प्रतिशत हिस्सा फाइनलाइज़ हो गया है। और बाकी हिस्सा भी जल्द ही पूरा हो जाएगा।

मोदी का "राफेल" दौरा

2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ। अप्रैल 2015 में पीएम मोदी ने फ्रांस का दौरा किया और उसी दौरे में 10 अप्रैल को घोषणा की कि वायुसेना की ज़रूरतों को देखते हुए फ्रांस से 36 जेट खरीदे जाएँगे। 126 जेट की ज़रूरत के बदल महज़ 36 जेट खरीदने की बात हुई। पुराने करार को रद्द कर दिया गया और डसॉल्ट के साथ नया करार किया गया।

जिस दौरे में पीएम मोदी ने ये घोषणा कि उससे ठीक एक दिन पहले विदेश मंत्रालय के सचिव ने कहा कि एचएएल के साथ जारी डील पर बातचीत चल रही है। मतलब कि एचएएल उस दौरे से पूर्व तक इस डील के केंद्र में बना हुआ था। 

नया करार-नयी शर्तें-नया पार्टनर

डसॉल्ट के साथ नया राफेल करार हुआ। और इसके मुताबिक तय किया गया कि डसॉल्ट ऑफसेट अमाउंट का 50 प्रतिशत हिस्सा भारतीय बाज़ारों में निवेश करेगा। मज़े की बात ये है कि डसॉल्ट को जो निवेश भारतीय बाज़ारों में करना था उसने उसके लिए चुना रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को - एक ऐसी कंपनी जिसे घोषणा से 14 दिन पहले रजिस्टर करवाया गया।

रिलायंस डिफेंस लिमिटेड का इतिहास

घोषणा से ठीक 14 दिन पहले अनिल अंबानी रिलायंस डिफेंस लिमिटेड रजिस्टर करवाते हैं। घोषणा के ठीक 14 दिन बाद रिलायंस एयरोस्टर्क्चर लिमिटेड को रिलायंस डिफेंस लिमिटेड में शामिल कर लिया जाता है। और यह नयी-नवेली कंपनी बन जाती है भारत के एक बड़े रक्षा सौदे में ऑफसेट पार्टनर। 

ख़ैर…जब भैया थानेदार तो फिर डर काहे का।

इस डील पर एक नज़र घुमाते ही साफ हो जाता है कि इस डील में - 

  • राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता किया गया।
  • पूँजीपतियों के साथ यारी निभाई गई।
  • रक्षा खरीद प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया गया और
  • तकनीक हस्तांतरण के ज़रिए राफेल के निर्माण में Make in India का स्कोप भी ख़त्म कर दिया गया।

बहरहाल, राफेल का ऊँट किस करवट बैठेगा - यह भविष्य के गर्भ में छिपा है। लेकिन एक बात ज़रूर है कि फिलहाल एक बार फिर इस ऊँट की सवारी कांग्रेस को मिल गई है। दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बीजेपी के पास चली गई थी। 

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