आर्थिक सुस्ती के दौर में है देश!
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आर्थिक सुस्ती के दौर में है देश!

Author: calender  22 Sep 2017

आर्थिक सुस्ती के दौर में है देश!

वित्तमंत्री अरुण जेटली की ओर से अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए जल्द ही अतिरिक्त उपाय करने की घोषणा यही बताती है कि आर्थिक-व्यापारिक गतिविधियों को बल देने की जरूरत सचमुच है। बेहतर होगा कि इस काम में और देर न की जाए, क्योंकि यह धारणा दूर करने की सख्त जरूरत है कि देश आर्थिक सुस्ती के दौर में है। जल्द जरूरी कदम उठाने इसलिए और भी आवश्यक हो गए हैैं, क्योंकि कुछ विपक्षी दल अर्थव्यवस्था की सेहत को लेकर एक नकारात्मक माहौल बनाने की कोशिश करते दिख रहे हैैं। इसके लिए वे जीडीपी के आंकड़ों में गिरावट, पेट्रोलियम उत्पादों में वृद्धि के साथ जीएसटी के अमल में आ रही बाधाओं के साथ अन्य मसलों का जिक्र कर रहे हैैं। कुछ तो ऐसे भी हैैं जो मंदी की आहट सुनने का दावा कर रहे हैैं। अर्थव्यवस्था के मामले में मिथ्या धारणाएं गहराने के पहले ही सरकार को सक्रियता दिखानी चाहिए, क्योंकि कई बार ऐसी धारणाएं वास्तविकता के विपरीत होते हुए भी कारोबारी माहौल पर बुरा असर डालती हैैं। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं कि सरकार अतिरिक्त उपायों के तहत क्या कदम उठाएगी, लेकिन माना यही जा रहा है कि वह कुछ ऐसे जतन करेगी जिससे उद्योग-व्यापार जगत के साथ आम लोगों का भी भरोसा बढ़े। इस भरोसे को बढ़ाने की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि एक तो नोटबंदी का थोड़ा-बहुत असर अभी भी नजर आता है और दूसरे जीएसटी व्यवस्था सुगम होने का नाम नहीं ले रही है। नि:संदेह कर प्रणाली में आमूल-चूल बदलाव के क्रम में कुछ समस्याएं आनी ही थीं, लेकिन यह ठीक नहीं कि जीएसटी के सूचना तकनीक नेटवर्क की खामियां दूर नहीं हो पा रही हैैं। सरकार को यह बात पहले से पता होनी चाहिए थी कि अधिकतर करदाता रिटर्न दाखिल करने के लिए आखिरी तिथि का इंतजार करते हैैं। चूंकि जीएसटी नेटवर्क में खामी के साथ अन्य समस्याएं भी सामने आ रही हैैं इसलिए शिकायतों का अंबार लगने के साथ असंतोष का भाव गहरा रहा है। अब जब सरकार अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कुछ अतिरिक्त कदम उठाने जा रही है तब फिर उसे यह भी देखना होगा कि क्या कारण है कि शेयर बाजार तो आगे बढ़ रहा है, लेकिन उसकी तुलना में आर्थिक-व्यापारिक गतिविधियां तेज होती नहीं दिख रही हैैं? इन गतिविधियों में वृद्धि के लिए विदेशी निवेशकों के साथ देसी निवेशकों की सक्रियता भी समय की मांग है। यह ठीक नहीं कि देसी निवेशक पूंजी होने के बाद भी नए उद्यम लगाते अथवा पुराने उद्यमों का विस्तार करने के लिए उत्साहित नहीं दिख रहे हैैं। इस पहेली का हल खोजा ही जाना चाहिए कि विदेश में कारोबार की संभावनाएं तलाशने वाले भारतीय उद्यमी देश में ऐसा क्यों नहीं कर रहे हैैं? इसी तरह उन कारणों का भी निवारण होना चाहिए जिनके चलते बाजार में मांग नहीं बढ़ रही है। इसी तरह जरूरी केवल यह नहीं है कि निजी क्षेत्र में बड़े उद्यम लगें और खुद सरकार अपने स्तर पर बड़ी परियोजनाओं को गति दे। जरूरी यह भी है कि लघु एवं मध्यम श्रेणी के उद्योगों का संजाल बिछे। दरअसल ऐसा होने पर ही रोजगार के उस सवाल का सामना करने में आसानी होगी जो सरकार की परेशानी का कारण बन रहा है।

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