‘20 साल बाद रोहिंग्या भारत के लिए ख़तरा कैसे बन गए’
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‘20 साल बाद रोहिंग्या भारत के लिए ख़तरा कैसे बन गए’

Author: calender  21 Sep 2017

‘20 साल बाद रोहिंग्या भारत के लिए ख़तरा कैसे बन गए’

रोहिंग्या मुसलमानों के मसले को दो रूपों में देखा जाना चाहिए. एक वह जो भारत में रह रहे हैं और दूसरे वो जो म्यांमार से भागने की कोशिश कर रहे हैं. भारत में रहने वाले रोहिंग्या मुसलमान 1980 और 1990 से रह रहे हैं जिन्हें यहां रहते हुए करीब 20 साल से अधिक समय हो चुका है. अगर यहां रहने वालों के बारे में कोई सुरक्षात्मक संदेह है तो यह भारत सरकार की ज़िम्मेदारी है. जहां रोहिंग्या रह रहे हैं, वहां सरकार ने नज़र क्यों नहीं रखी. 20 साल के बाद यह तर्क अचानक कहां से आया कि रोहिंग्या हमारे लिए ख़तरा हैं. भारत सरकार की रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर नीति बहुत जटिल रही है. इसका एक पहलू सुरक्षा का है. म्यांमार से जुड़ी सीमा बिलकुल बंद है, वहां से कोई शरणार्थी नहीं आ रहे हैं लेकिन भारत में रह रहे रोहिंग्या की ज़िम्मेदारी भारत की है. मैं समझता हूं कि मानवाधिकार का समर्थन करने वाले हमारे देश को ऐसा कोई फ़ैसला जल्दी में नहीं लेना चाहिए. सरकार क्या करेगी, वह अदालत में ज़ाहिर होगा. म्यांमार से दोस्ती और उसकी चीन से बढ़ रही दोस्ती का भी पहलू है. म्यांमार से लगती सीमा को लेकर भी भारत उसका सहयोग चाहता है. म्यांमार एक्ट ईस्ट नीति के कारण भी भारत के लिए महत्वपूर्ण है. रोहिंग्या मसले को लेकर बांग्लादेश और म्यांमार एक दूसरे के आगे तने हुए हैं जिसमें चीन ने मध्यस्थता के लिए कहा है. इसको भारत केवल देखता नहीं रह सकता है. अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा होने के कारण भारत की रोहिंग्या को लेकर नीति जकड़कर रह गई है इसलिए उसके अलग-अलग प्रारूप नज़र आते हैं. भारत ने संयुक्त राष्ट्र में शरणार्थियों को लेकर किसी संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं लेकिन इतिहास देखें तो भारत ने हमेशा शरणार्थियों का स्वागत किया है. 1950 से तिब्बत से शरणार्थी आते रहे हैं. इसके अलावा बांग्लादेश, श्रीलंका से भी आते रहे हैं. रोहिंग्या को लेकर नागरिकता देने का प्रश्न ही नहीं है. रोहिंग्या शरणार्थी के रूप में रहेंगे या नहीं यह सवाल है. इसमें सांप्रदायिकता का मसला भी कहीं न कहीं है. जम्मू में बाहर से आए हिंदुओं को नागरिकता देने की बात हो रही थी. यह दोगुली नीति है. 1991-92 में जब रोहिंग्या आए थे तब उनका स्वागत किया गया था लेकिन आज नीति कुछ और हो गई है जिसे नहीं बदलना चाहिए. म्यांमार में हिंसा के कारण हज़ारों रोहिंग्या मुसलमानों को जान बचाकर बांग्लादेश भागना पड़ा. रोहिंग्या मुसलमानों के इस पलायन के बीच भारत में रह रहे रोहिंग्या पर भी सवाल उठ रहा है. संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी के मुताबिक़, भारत में रोहिंग्या मुसलमानों की रजिस्टर्ड संख्या 14 हज़ार से अधिक है लेकिन कुछ दूसरे आंकड़ों से पता चलता है कि यह संख्या लगभग 40 हज़ार के करीब है जो अवैध रूप से भारत में रह रहे हैं. रोहिंग्या मुख्य रूप से भारत के जम्मू, हरियाणा, हैदराबाद, दिल्ली, राजस्थान के आस-पास के इलाकों में रहते हैं.

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