कभी न कभी हर दंगाई का इंसाफ होगा
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कभी न कभी हर दंगाई का इंसाफ होगा

NDTV calender  17 Dec 2018

कभी न कभी हर दंगाई का इंसाफ होगा

वर्ष 1984 की सिख-विरोधी हिंसा के एक मामले के लिए सज्जन कुमार को सुनाई गई उम्रकैद की सज़ा का एक बड़ा प्रतीकात्मक मूल्य है. इससे इस बात की पुष्टि होती है कि गुनहगार कितने भी ताकतवर क्यों न हों, देर-सबेर इंसाफ की ज़द में आ जाते हैं. इस नैतिक बल से ज़्यादा यह लोकतांत्रिक भरोसा पुख्ता हुआ है कि चुनावों की परिणामवादी राजनीति के समानांतर और उससे आगे हमारी व्यवस्था की कई और परतें हैं, जो तमाम बाधाओं के बावजूद न्याय सुनिश्चित करती हैं, क्योंकि यह अनुभव आम है कि इस देश में राजनीति जैसे न्याय के खिलाफ खड़ी है. ताकतवर लोग हमेशा अपराधियों को बचाने में जुटे रहते हैं.

 
जिन लोगों ने 1984 को अपने सामने घटित होता देखा है, उनके भीतर यह सिहरन भरी स्मृति कभी नहीं जाएगी कि किस बेरहमी से तब लोग मारे गए थे, उनके घर लूटे गए थे और उसके बाद किस तरह मामलों की जांच रोकी गई थी - उन्हें दर्ज तक नहीं किया गया था. यह आज़ाद भारत की अराजकता के सबसे कलंकित तीन दिन थे. दुर्भाग्य से ऐसी हिंसा हमें बाद के दौर में भी देखने को मिली है, लेकिन आज 1984 की हिंसा का इंसाफ होता दिख रहा है तो हम उम्मीद कर सकते हैं कि देर-सबेर सामूहिक हिंसा के दूसरे मामलों और 2002 का भी इंसाफ होगा.

1984 की हिंसा और 2002 के दंगों में एक दुखद साम्य है. दोनों मामलों में राज्य के देखते-देखते हज़ारों लोग घरों से निकालकर सड़कों पर मार दिए गए, उन्हें ज़िंदा जलाया गया, महिलाओं से बलात्कार किया गया. 18 साल के अंतर पर हुए इन दो हत्याकांडों में इंसाफ को लगातार राजनीति ने स्थगित रखा. महज दो साल के राजनीतिक अनुभव पर प्रधानमंत्री बन गए राजीव गांधी ने तब यह हैरान करने वाला बयान दिया था - "एक बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती कुछ हिलती ही है..." यह वक्तव्य भले नादानी में दिया गया हो, लेकिन आने वाले दिनों में तमाम दंगाइयों को बड़ी निस्पृह क्रूरता के साथ बचाया गया, जिसका गुनाह कांग्रेस सरकार पर जाता है.

मगर 1984 में अकेली कांग्रेस दोषी नहीं थी. तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के बड़े सम्मानित नेता नानाजी देशमुख ने बाकायदा लेख लिखकर इस हिंसा का बचाव किया था. यह अनायास नहीं है कि 1984 के उन चुनावों के तुरंत बाद कांग्रेस ऐसी जीती, जैसी इस देश में आज तक कोई पार्टी नहीं जीती. उसे लोकसभा की 400 से ज़्यादा सीटें मिलीं. यह बात कई बार कही जा चुकी है कि उस चुनाव में संघ परिवार ने कांग्रेस की मदद की और भारतीय जनता पार्टी (BJP) को महज़ दो सीटें मिलीं.

यह बात कुछ स्तब्ध करती है कि इतनी बड़ी हिंसा के बावजूद 1984 में जनता ने कांग्रेस को इतने बड़े पैमाने पर जीत क्यों दिलाई? क्या यह हमारे चुनावी लोकतंत्र का एक काला पहलू है या हम भीड़ की हिंसा के ऐसे आदी हैं और इस कदर सांप्रदायिक हैं कि भीड़ की हिंसा को प्राकृतिक न्याय का हिस्सा मान लेते हैं?

1984 में कांग्रेस के नेतृत्व में जो हिंसा तीन दिन देशभर में चली, वही BJP के नेतृत्व में 2002 में गुजरात में दो महीने चली. 1984 में करीब 3,000 लोग मारे गए, जबकि 2002 में 2,000 लोगों के मारे जाने की बात सामने आई. 1984 में हिंसा के निशाने पर सिख थे, तो 2002 में मुसलमान. 1984 के कत्लेआम के पीछे इंदिरा गाधी की हत्या और उसके पहले सिख आतंकवाद द्वारा की गई हिंसा की दलील दी गई, तो 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बों को जलाने का बदला बताया गया. 1984 में अगर राजीव गांधी ने हिंसा के पक्ष में एक दलील दी, तो 2002 में खुफ़िया एजेंसियों और प्रशासन की सलाह को नज़रअंदाज़ कर गोधरा में मारे गए लोगों के शव अहमदाबाद लाकर BJP नेताओं ने उनके सार्वजनिक प्रदर्शन से लोगों का गुस्सा भड़काया.

अगर ध्यान दें, तो एक और बात समझी जा सकती है. 1984 और 2002 में पार्टियों के बैनर भले बदल गए, लेकिन इनमें शामिल लोग कमोबेश एक ही थे. 1984 में जिन लोगों ने सिखों को घरों से निकालकर मारा, उनकी दुकानें लूटीं, वही लोग 2002 में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा में शामिल या इसके समर्थक रहे.

 
अफ़सोस की बात यह है कि आने वाले तमाम वर्षों में कांग्रेस और BJP 1984 और 2002 को लेकर एक-दूसरे से राजनीति करती रही हैं. 2002 पर बयान देने वाली कांग्रेस को 1984 याद नहीं आता है, जबकि 1984 की याद दिलाने वाली BJP 2002 को भूल जाती है.

आज भी वित्तमंत्री अरुण जेटली दिल्ली हाइकोर्ट के फैसले के बाद बयान देने आए, तो उन्होंने बिल्कुल उचित ही सज्जन कुमार को 1984 की हिंसा का प्रतीक बताया. यह भी बिल्कुल ठीक कहा कि वह पूरी हिंसा कांग्रेस के नेतृत्व में हुई और कांग्रेस नेताओं ने इस हिंसा के आरोपियों को बचाने का काम किया. हिंसा के आरोपी बाद में कांग्रेस और UPA सरकारों में मंत्री भी रहे, यह बात अपने-आप में शर्मनाक है.

 
लेकिन अरुण जेटली को इस पूरी बयानबाज़ी के दौरान एक बार भी 2002 याद नहीं आया. यह याद नहीं आया कि इस हिंसा के आरोपियों में उसके अपने नेता रहे हैं और वे शीर्ष पदों तक जाते रहे हैं. 2002 के इंसाफ से BJP उसी तरह मुंह चुराती रही है, जिस तरह 1984 के इंसाफ से कांग्रेस. यही नहीं, 2002 की हिंसा के बाद गुजरात में डगमग BJP सरकार को जनता ने उसी तरह बहुमत दिया, जिस तरह 1984 की हिंसा के बाद कांग्रेस को दिया.

ऐसा भी नहीं कि 2002 भारतीय समाज में सांप्रदायिक क़त्लेआम और भी़ड़ की हिंसा का आख़िरी उदाहरण है. 2002 के बाद भी देश के अलग-अलग हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा बड़े पैमाने पर हुई है और भीड़ की हिंसा एक नए चिंताजनक तत्व की तरह पहचानी जा रही है, लेकिन यहां भी राजनीतिक दलों की अपनी प्राथमिकताओं के हिसाब से तय किया जा रहा है कि किस मामले में जांच होगी और किसमें नहीं.

 
एक तरह से देखें, तो हमारी पूरी राजनीति इंसाफ को जैसे लगातार असंभव बनाती जा रही है. इंसाफ के नाम पर या तो भीड़ द्वारा किया जा रहा न्याय है या जातीय और सामुदायिक पहचानों के आधार पर चल रही एकतरफा कार्रवाई. इस घटाटोप में कभी किसी सज्जन कुमार के खिलाफ फैसला आता है, तो एक बड़ी उम्मीद जागती है - तमाम राजनीतिक दुरभिसंधियों के खिलाफ यह उम्मीद कि देर-सबेर इंसाफ का चक्का घूमेगा और अपना काम करेगा. अगर 34 साल बाद सज्जन कुमार को सज़ा हो सकती है, तो देर-सबेर दूसरे भी इसकी परिधि में आएंगे और वे लोग भी, जो फिलहाल दूसरों का इंसाफ कर रहे हैं और अपनी पीठ ठोक रहे हैं.

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