क्या इस बार भी मेवाड़ की जनता तय करेगी "राजस्थान" का उत्तराधिकारी ?
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क्या इस बार भी मेवाड़ की जनता तय करेगी "राजस्थान" का उत्तराधिकारी ?

Author: Nilanjay Tiwari  07 Dec 2018

क्या इस बार भी मेवाड़ की जनता तय करेगी "राजस्थान" का उत्तराधिकारी ?

ऐसा माना जाता है जयपुर का रास्ता मेवाड़ से निकलता है। "तवे की रोटी अलटते पलटते रहना चाहिए।" यह महज कहावत ही नही मेवाड़ की सच्चाई बन गयी है। मेवाड़ में अधिकतर सीटों पर जो जीता वही सिकन्दर कहलाया।

पिछले दो दशकों से यहाँ की जनता मन मुताबिक सत्ता की रोटी पलटती आयी है। यही कारण है कि कांग्रेस भाजपा की सीटों पर काबिज होने की पूरी कोशिश कर रही तो भाजपा अपनी मौजूदा सीटों को बचाने के लिए जद्दोज़हद कर रही है। यहां तक इस बार राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत भी मेवाड़ से ही की और एक कहावत जो उस दौरान उन्होंने कही "पूरी छोड़ ने आधी खानी, पण मेवाड़ छोड़ने कठेई नि जानी" इसका मतलब भले ही पूरा छोड़कर आधा ही खाओ, लेकिन मेवाड़ छोड़कर कहीं न जाओ| यह साफ़ दर्शाता है की प्रदेश की प्रदेश की मुखिया खुद इस भरम को मानती हैं| अब आखिर माने भी क्यों नहीं क्योंकि जब-जब वसुंधरा राजे ने यहाँ से शुरुआत की तब-तब उन्हें जयपुर का सिंहासन मिला|

ये कुछ चुनावी आंकड़े हैं जिनके वजह से ही ऊपर कहे गए कहावतों को अक्सर चुनावी भाषणों, अख़बारों व खबरों में तवज्जो दी जाती है|

चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 1998 के विधानसभा चुनाव में मेवाड़-वागड़ क्षेत्र की कुल 30 सीटों में से कांग्रेस को 23 जबकि भाजपा को महज चार सीटें मिली और सरकार कांग्रेस ने बनाई। साल 2003 के विधानसभा चुनाव में इन 30 विधानसभा सीटों में से 21 पर भाजपा को जीत मिली, कांग्रेस को सात सीटों से ही संतोष करना पड़ा और सरकार भाजपा ने बनाई।

इसी तरह, वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव के वक्त परिसीमन के कारण जब मेवाड़-वागड़ क्षेत्र की कुल सीटें 30 से घटकर 28 हो गईं तो कांग्रेस को 20 और भाजपा को छह सीटें मिलीं। जाहिर तौर पर, उस वक्त सरकार कांग्रेस ने बनाई। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र की 25 सीटों पर भाजपा को जीत मिली जबकि कांग्रेस सिर्फ दो सीटें जीत सकी। ऐसे में एक बार फिर भाजपा की सरकार बनी।

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मेवाड़ के तमाम जिलों में भाजपा का वर्चस्व है लेकिन जमीनी स्तर पर काम ना होने से भाजपा के खिलाफ नाराजगी बढ़ी है| मेवाड़ में भाजपा के लिए यहां राष्ट्रीय स्तर के नेता की गैर मौजूदगी बड़ी दिक्क्त बनकर उभरी है| हालांकि गुलाब चंद कटारिया और किरण माहेश्वरी भाजपा के दो बड़े चेहरे हैं| लेकिन यह भी प्रदेश स्तर की राजनीती तक ही सिमित हैं| खबर यह भी है की इन दोनों की ही आपस में बनती नहीं|
वहीँ कांग्रेस भाजपा के मुकाबले संगठन स्तर पर कमजोर दिखती है| लेकिन इस बार चुनाव में गुटबाजी कम नजर आयी| मेवाड़ से कांग्रेस के पास सीपी जोशी व गिरिजा व्यास जैसे राष्ट्रीय स्तर के नेता मौजूद हैं जो यहां कांग्रेस की कमान संभाले हुए हैं| हालाँकि ये धुरंधर भी एक दूसरे के विरोधी माने जाते थे लेकिन राजस्थान में सरकार बनाने के लिए इस बार दोनों साथ आ गये हैं| इस क्षेत्र में जो भी विकास कार्य हुआ वो उन योजनाओं के तहत हुआ जो यूपीए सरकार की देन है| भाजपा की एक दिक्कत यह भी है कि आपसी गुटबाजी भी यहां खुलकर दिख रही और उसके पास यहां गिनाने को कुछ भी नहीं है।

मेवाड़ ने प्रदेश को हरदेव जोशी, मोहनलाल सुखाड़िया, शिवचरण माथुर व हीरालाल देवपुरा जैसे तेज तर्रार मुख्यमंत्री दिए, वे सभी कांग्रेस से थे| अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो इसे कांग्रेस का आना नहीं  बल्कि बीजेपी का जाना कहा जाएगा|  मेवाड़ ने कभी किसी को मिलाजुला बहुमत नहीं दिया, जब दिया स्पष्ट दिया| इसीलिए मेवाड़ से निकला राजनीतिक संदेश पूरे राजस्थान में परिलक्षित होता है| देखना है की आने वाले 11 दिसंबर को मेवाड़ फिरसे इतिहास का गवाह बनेगा या फिर वसुंधरा राजे इतिहास को बदलने में कामयाब होंगी ?

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